पुरबिया कौन?

वैसे तो देश के पूरब में बंगाल है, लेकिन पुरबिया वे हैं; जो पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में रहते हैं. कुछ हद तक मूल भोजपुरी से जिनका सरोकार है, वे सभी. यही हमारी सैद्धांतिक पहचान है. महाराष्ट्र में लोग हमको भईया कहते हैं. भारत में 16 करोड़ लोग भोजपुरी बोलते हैं या जानते हैं. यानी देश में हर आठवां आदमी पुरबिया है. खैर, शिव के धनुष पर बसा नगर काशी, पहली बार यज्ञ होत्रा प्रयागराज, नाथ संप्रदाय के प्रणेता बाबा मत्सयेंद्र और गोरख की धरती गोरखपुर, ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के अवतारी मुनि और सती अनुसूइया के बेटे चंद्रमा, दुर्वासा और दत्तात्रेय की धरती आजमगढ़; और अनेकादि विभूषितांगों की जन्मभूमि है ये पुरबिया प्रांत.

भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू, कविवर निराला, अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा के मीमांसक और 169 यात्रा वृत्तांत की किताबें लिखने के साथ चौदह से अधिक भाषाओं के मूर्धन्य विद्वान महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरबिया हैं. दुनियाभर में मुशायरों को प्रसारित करने वाले रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी भी पुरबिया हैं. एशिया के प्रकाशपुंज गौतम बुद्ध की निर्वाण स्थली कुशीनगर में है. निर्गुण शाखा के सबसे बड़े कवि कबीर भी पुरबिया हैं. आजादी के लिए अपनी किताब सोजे वतन से जंग झेड़ने वाले प्रेमचंद भी पुरबिया हैं. प्रथम स्वाधीनता संग्राम के नायकों में से एक मंगल पांडे पुरबिया हैं. पुरबियों ने हर विषय और क्षेत्र में महारत हासिल की है. आध्यात्म से लेकर विज्ञान और राजनीति से लेकर साहित्य तक. कोई सिरा हमसे अछूता नहीं रहा.

फिर भी कोरोना काल में महाजनों और व्यापारियों ने सबसे पहले पुरबियों को ही खदेड़ा. वे खदेड़ सकते हैं, क्योंकि हम इसी लायक हैं. हमने आजाद भारत में अपने स्वाभिमान को आजीविका नाम के दावानल में झोंक दिया. या यूं कहिए कि झोंकना पड़ा. हमारे शहरों में केवल शासकीय दफ़तर हैं, औद्योगिक केंद्रों का कोई अता पता नहीं. अब भूख के आगे तो बड़े से बड़ा झुक जाता है, फिर हमारी क्या बिसात की इसका सामना कर सकें. ये पुरबियों का दुर्भाग्य ही है कि भारत के संसदों में इनका जो प्रतिनिधि चुन कर जाता है, वो पिछले सत्तर सालों में छोटे शहरों को भारतीय अर्थव्यवस्था से जोड़ने की बात नहीं उठा पाया. सोचिए, हमारे गुलामी के दिनों और आजादी के दिनों में कितने बदलाव आए? अंग्रेजों के दौर में पुरबिया किसान नील की खेती करने में जी जान लगा देते थे और अब बिचौलियों और जमाखोरों को लाभ पहुंचाने के लिए दिन रात मेहनत करते हैं. अब बिज़नेस में कम जोखिम है और खेती में ज्यादा. पुरबियों में इस बात का असंतोष हमेशा रहा कि उन्हें हमेशा कुशल और प्रवीण होने के बाद भी कमतर समझा गया. हालांकि प्रतिभाएं कभी दबाने से रुक नहीं पाई, लेकिन कोशिशें भरपूर की गई. डीजल का दाम अनायास बढ़ाने वाली सरकारें किस मुंह से किसानों की हितैषी बनती हैं, समझ से परे है.

वेद: समग्र अध्ययन भाग-1

वेद, दुनिया के प्राचीन साहित्य हैं. इसी वजह से मैं कुछ दिनों से इसका अध्ययन कर रहा हूं. नवजागरण काल में दयानंद सरस्वती ने आह्वान करते हुए कहा था कि वेदों की ओर लौटो. ऋग्वेद के 189 सूक्त अग्निदेव को समर्पित हैं. इसे पढ़ने के बाद मुझे जो कुछ समझ आया नीचे बता रहा हूँ.

यज्ञ, एक वैज्ञानिक और प्राकृतिक क्रिया है. जैसे सूरज वाष्पोत्सर्जन से बादल बना रहा है. जिससे बरसात होगी और लोग लाभान्वित होंगे. जैसे यज्ञ में हव्य की आहूति दी जाती है, ठीक उसी तरह जल स्रोत हव्य की तरह सूरज रुपी अग्नि में जलकर बादल बना रहे हैं. ये यज्ञ की एक व्यवस्थित क्रिया है, जिसे विज्ञान भी सही ठहराता है, और इस यज्ञ को वाष्पीकरण कहा जाता है.

मनुष्य संतान उत्पत्ति के लिए वीर्य को मादा जननांग में हव्य करता है तो प्रजनन रूपी यज्ञ संपादित होता है और उसे संतान की प्राप्ति होती है. ऋग्वेद की माने तो सृष्टि में जो कुछ भी हो रहा है, उसके पीछे किसी ना किसी यज्ञ का हाथ है. रसायनज्ञ इसे रिएक्शन कहेंगे. यानी किसी एडिशन रिएक्शन में जो कुछ बन रहा है, उसे यज्ञ कहेंगे. फसलों के संवर्धन में भी एक विशेष प्रकार का यज्ञ हो रहा है. वृक्ष, क्लोरोफ़िल की वजह से हरे-भरे हैं. ये भी एक तरह का यज्ञ है.

धरती पर प्रकाश और ऊर्जा का स्रोत सूर्य है. वो अग्नि की वजह से ही देदीप्यमान हो रहा है. यानी अगर आप एक जलाशय बना रहे हैं तो बरसात की वजह बन रहे हैं, अप्रत्यक्ष रूप से यज्ञ कर रहे हैं. वृक्ष लगा रहे हैं तो भी यज्ञ कर रहे हैं. यज्ञ को एक अनुष्ठान के तौर पर करना और आहुति के तौर पर देवों को हव्य देना. इन प्राकृतिक यज्ञों के कारण अग्नि, वरूण को धन्यवाद कहना भर है.

पूरबिया: लड़कियों की उड़ान पर पहरे हैं!

पूरब यानी पूर्वांचल की बेटी सिर्फ़ अपने पिता की बेटी नहीं होती, वो पूरे गांव की, हर घर की बेटी होती है. हां, बेटे जरूर सबके अपने होते हैं. यहां किसी की बेटी की शादी में जब मंडप यानी मांडव बनता है तो हर घर का एक आदमी अपनी क्षमता के हिसाब से योगदान देता है. बांस बंटोरने के लिए लोग भले उसके मालिक से पूछे लेकिन बेटी की शादी के नाम पर सब इसे अपना सौभाग्य ही मानते हैं. कोई बांस बटोर रहा होता है, कोई मंडप की आकृति के हिसाब से गड्ढे बना रहा होता है. बढ़ई लोग मंडप का शीर्ष बनाने के लिए बांस से लड़की के हाथ के नाप से नौ गुना या सात गुना लंबा फलठा बनाते हैं. जब तक बिटिया की शादी हो नहीं जाती, हर प्रयोजन पर गांव के हर घर के लोग शामिल होते रहते हैं. गांव-जवार में लड़की के जन्म को कोई अभिशाप नहीं मानता, लोग शान से कहते हैं कि “लक्ष्मी आईल बाटी” और उनके ऐसा कहने के दौरान आप अपार हर्ष महसूस करेंगे.

मुझे लगता है कि हर समाज में कुछ ना कुछ विकार या कमियां होती होंगी. इन्हें अवधारणा नहीं बना लेना चाहिए. बहुत सारी जगहों पर लड़की के जन्म पर सोहर नहीं होता. लड़के के जन्म पर ही होता है. ये लोगों की संकुचित सोच है. इसे दूर करने की जरूरत है.

पूरबिया लोगों में दहेज का चलन अभी ख़त्म नहीं हुआ है. बहुत सारे पढ़े-लिखे लोग इसे बढ़ावा दे रहे हैं. ये शिक्षा-अशिक्षा की बात नहीं है. लोग खुलकर दहेज की मांग करने से नहीं डरते हैं, ये बहुत बड़ी सामाजिक बुराई है. इसका बहिष्कार किया जाना चाहिए. और अगर युवा वर्ग ठान ले कि इस कलंक को अपने माथे से हटाना है तो ये इतना मुश्किल नहीं है.

जो समर्थ हैं और जिनके पास आय के समुचित साधन हैं, उनके लिए दहेज बड़ी बात नहीं, लेकिन इस चलन को बढ़ावा देकर वे उनकी आफत बढ़ा रहे हैं, जिनकी बेटियों की शादी में पुरखों की जमीनें बिक जाया करती हैं. कर्ज चढ़ जाते हैं. अमूल्य संपदाएं गिरवी रखनी पड़ती हैं.

पुरबिया समाज बहुत सुंदर है. ये और सुंदर हो जाएगा. जब हम और आप मिलकर अपने समाज से इस दहेज लोलुप व्यक्तियों को इस लत से बाहर निकाल सकेंगे. कौन बाप अपनी बेटी की खुशी नहीं चाहता, क्या जरूरी है कि वो इसका प्रमाण खुद को मुसीबत में डालकर दे. इसलिए एक आदर्श समाज के तौर पर हमें दहेज के दावानल से पीढ़ियों को खाक होने से बचाने की जरूरत है.

अखबारों में खबरें पटी पड़ी मिलती हैं कि घरेलू हिंसा की बड़ी वजह कहीं ना कहीं ये दहेज भी है. तो दहेज का बहिष्कार कर हम अपने समाज को दैनिक हिंसा से भी उबार सकते हैं.

आधी दुनिया ने हमें ममता, स्नेह, प्यार और ताउम्र साथ देकर हर मुश्किल को आसान किया है. तो हमारा फर्ज भी बनता है कि हम इनके सामने आने वाले सभी अवरोधों को दूर करने में थोड़ी मदद करें. अभी बहुत आंशिक रूप में ही पूरब के जिलों में लड़कियों को उड़ान भरने की आजादियां मिल पाई हैं. जैसे यहां लड़कों की पढ़ाई पर लाखों रुपये खर्च करने की रवायत है लेकिन लड़कियों की पढ़ाई को फिजूलखर्ची माना जाता है.

इसके अपवाद भी हैं, लोग अपनी बेटियों को भी खूब जमकर पढ़ा रहे हैं लेकिन अगर गांव जंवार में इसकी संख्या की बात की जाये तो वो उंगलियों पर गिने जा सकते हैं. लड़कियों को एम ए, बी एड करवा देंगे! लेकिन इंजीनियरिंग, मेडिकल की तैयारी में बहुत कम लोग बाहर भेजते हैं. ये चलन भी ख़त्म होना चाहिए.

आतंकवाद से भी ख़तरनाक है लश्करे मीडिया?

लश्कर-ए-मीडिया एक गिरोह है, जो आतंकवाद से भी नुकसानदेह है. महामारी के समय अगर ये चाहती तो अस्पतालों की खराब व्यवस्था पर रिपोर्ट कर लाखों जिंदगियां बचा सकती थी. लेकिन इससे ऐसा नहीं किया.

सुशांत+रिया+कंगना+नेपोटिज्म+अनुराग+बाॅलीवुड ड्रग रैकेट से क्या निकला और कितने भारतवासियों का लाभ हुआ. इसमें दूरदर्शिता और प्राथमिकताओं के मूल्यांकन का इतना अभाव है कि पूछिए मत. सरकार का हेल्थ सिस्टम धड़ाम है, कोई कुछ नहीं कहेगा. इकाॅनमी पातालपुर पहुंच गई, सन्नाटा है. महंगाई आसमान पर है. वायु प्रदूषण फैलने पर कोरोना और अधिक तेजी से फैलेगा, क्या तैयारियां हैं! नहीं मालूम.

बस इतना पूछ लीजिए कि कोरोना महामारी में मीडिया की भूमिका क्या रही? सही ढंग से जवाब तो देने से रहे. कहेंगे सुशांत सिंह की मौत पर सच जानने में कोरोना रिपोर्टिंग छूट गई. लाखों लोग मारे गये. एक ड्रगी अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत को न्याय के नाम पर लोगों को सरकारी विफलताओं से गुमराह करना अगर राष्ट्रवाद है, तो तुम जाहिल हो इस विषय है. राष्ट्रवादी होने का मतलब है, किसी लड़ाई में उन भावों का उदगार जो हमें तनकर खड़ा रख सके. कोरोना महामारी में भी एक अदृश्य दुश्मन से लगातार युद्ध हो रहा है लेकिन मीडिया वो भाव नहीं जगा पा रहा कि इससे लड़ रहे योद्धाओं की सलामती के लिए कुछ तो प्रयास हो सकें.

पुरबिया लोक आध्यात्म: जहां बादल नहीं ‘भगवान’ बरसते हैं!

वैसे तो भारत की सभी लोग संस्कृतियां खास हैं लेकिन पूरबिया, लोक संस्कृति में पला बढ़ा. इस नाते इसे ज्यादा करीब से जानने समझने का मौका मिला. यहां बादल नहीं बरसते, भगवान बरसते हैं. सूखे की स्थिति में आप आसानी से किसी मुंह ये जरूर सुन पाएंगे कि ‘अब त बरस दा भगवान’. बच्चे भगवान को बरसने के लिए इतना विनम्र निवेदन करते हैं कि बारिश इतनी ज्यादा हो जाती कि फिर बाढ़ आना लाजमी है. ‘दऊ-दऊ बरखा, गगरी में अड़सा’, माने दऊ यानी भगवान बरसिए और हमारे गागर को भर दीजिए. जब कई दिन तक बारिश नहीं रुकती तो भी पुरबिया बच्चे फिर से ईश्वर से करबद्ध निवेदन करते हैं कि ‘दऊ दऊ घाम करा, सुगवा सलाम करा. ये पुरबिया आध्यात्म है, जिसे घर की या गांव की कोई बूढ़ी दादी सारे बच्चों को रटा दिया करतीं हैं.

हम पूरब के लोगों की आस्थाएं भी बड़ी सीमित हैं. गांव-पुर में एक ऐसे देवी जी के भक्त जरूर मिल जाएंगे. जो देवीजी के भक्त कम और देवीजी इनकी गुलाम जरूर लगने लगती हैं. इन्हें लोग ओझा-सोखा कहते हैं. इनको सुनकर लगता है कि ये हुक्म करते हैं, देवीजी को वही मानना पड़ता है. कालीजी के चंवरा पर कोई ना कोई सोखा जरूर मिल जाएगा आपको. अब मान लीजिए किसी की तबियत खराब हो गई, तो उनकी मां को पहले शंका होगा कि कहीं कोई चुड़ैल भूत का साया तो नहीं. ये अंधविश्वास अब कम हुआ है, पहले बहुत ज्यादा था. तो ऐसे में वो मां सोखा बाबा को दिखाने पहुंचती. सोखा बाबा देवी मां को मना रहे हैं – “मान जो देवी, काहे ना मानत हई रे. कहां पकड़ली एके. वग़ैरह. ऐसी अनगढ़ आस्था पर भी इन्हें फक्र होता है क्योंकि इसमें कोई छल नहीं है.

जमींदारों ने चालाकी की या निषाद लोगों को ही इससे फायदा है पता नहीं? निषादों को रहने के लिए नदियों से सटे जमीन के हिस्से दे दिये कि बाढ़ आए तो पहले इनका ही घर डूबे. एक नज़रिया ये भी है कि बाढ़ में नांव चलाने से कईयों की आजीविका जुड़ी हुई है. और तराई के खेतों में सब्जियां और कुछ फसलें अच्छी होती हैं. वे जाल लगाकर मछलियों को पकड़ भी सकते हैं, जिससे कुछ आमदनी हो सके. इन सबको निषाद सिर्फ़ पैसे के लिए नहीं करता, ये जमींदारों के लोक आध्यात्म का जीता जागता प्रमाण है. क्योंकि कई उदार जमींदारों ने जमींदारी उन्मूलन से पहले ही कितनी निषादबस्तियां और हरिजनबस्तियां बसाईं. इसकी तसदीक़ हर पूरबिया जिला देता है, इसे दलित विमर्श की सड़ाँध में मत गिरने दीजिएगा…

अमेरिका में राष्ट्रपतियों के स्वास्थ्य को छिपाने का लंबा इतिहास है

  • व्हाइट हाउस के चीफ ऑफ स्टाफ मार्क मीडोज ने कहा कि ट्रंप शुक्रवार को ‘बेहद चिंताजनक’ स्थिति से गुजरे हैं और अगला 48 घंटा उनके स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है.
  • विल्सन की बीमारी को व्हाइट हाउस ने गुप्त रखने की कोशिश की थी.
  • राष्ट्रपति ग्रोवर क्लीवलैंड की बीमारी को गुप्त रखते हुए लॉन्ग आइलैंड साउंड में एक निजी जहाज में मुंह का ऑपरेशन कराया था, जिसमें कैंसर वाले हिस्से को हटाया गया.
    -राष्टपति लिंडन बी जॉनसन ने गुप्त तरीके से 1967 में अपने हाथों के एक घाव को हटवाया था.
    -युद्ध और मंदी के समय देश का नेतृत्व करनेवाले फ्रेंकलिन डी रूजवेल्ट को 1944 में उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी बीमारियों का पता चला.
  • इतिहासकार रॉबर्ट डेलेक का कहना है कि राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी भी दर्द और बीमारी का सामना कर रहे थे और दिन में कम से कम आठ गोलियां लेते थे लेकिन केनेडी लगातार अपनी बीमारी को छुपाए रखें.
  • राष्ट्रपति ड्वाइट डी आइजनहावर को 1955 में गंभीर रूप से दिल का दौरा पड़ा. लेकिन शुरूआती दौर में इसकी जानकारियां छिपाई गईं.
  • 1841 में विलियम हेनरी हैरिसन निमोनिया की वजह से बीमार पड़े। उनकी बीमारी गंभीर थी. लेकिन व्हाइट हाउस ने जनता को उनकी बीमारी के बारे में नहीं बताया.

नशे में शायर है: जनाब जौन एलिया

जनाब जौन एलिया को बहुतेरे लोग पाकिस्तानी शायर कहते हैं, लेकिन उनका जन्म 1931 में उत्तर प्रदेश के अमरोहा में हुआ. वे पाकिस्तान 1957 में गये. यानी कि 26 साल हिंदुस्तान में ही रहे. जौन उर्दू अदब के बड़े शायर हैं.

8 साल से ही उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था. जौन एलिया जब इंशा के संपादक थे, तो उनकी मुलाकात उस समय मशहूर लेखिका ज़ाहिद हिना से हुई. ज़ाहिद और जौन एक दूसरे के प्यार में पड़ गये. ज़ाहिद हिना से बाद में जौन की शादी भी हुई लेकिन ये शादी 1980 में टूट गई और जौन ने जाहिद से तलाक ले लिया.

ज़ाहिद हिना जंग और एक्सप्रेस में बतौर लेखिका लंबे समय तक काम किया. ज़ाहिद की मानें तो जौन एलिया बड़े गुस्सैल और शराबी हो गये थे. यही अलगाव या हिज्र ही जौन को दुनिया में मशहूर बना गई. मुशायरों में जौन साहेब को सुनने वालों का हुजूम उमड़ पड़ा. जौन का एक शेर है कि –

हां ठीक है,
मैं अपनी अना का;
मरीज़ हूं!
आखिर मेरे मिज़ाज में,
क्यों दख्ल दे कोई?

किसानों का कोई आंदोलन नहीं होता!

किसानों का कोई आंदोलन नहीं होता. किसानों का कोई झंडा नहीं होता. जो आंदोलन कर रहे हैं ना. ये सब सक्षम किसान हैं. किसानों की बदहाली देखनी हो ना. तो किसी गाँव में जाकर देखिए. बेचारे पूरा जीवन खेती में खपा देने के बाद भी सम्मान के साथ जी नहीं पाते. वो आंदोलन करने सड़कों पर आएंगे तो उनका परिवार उस दिन भूखा रह जाएगा. उनकी गायें और भैंसें भूखी रह जाएंगी.

किसान उन लोगों को कहते हैं, जिनकी आजीविका का साधन सिर्फ कृषि हो. बहुतेरे किसान तो ऐसे हैं देश में जो मंडी जाते ही नहीं. अनाज के क्रय विक्रय से उनका कोई लेना देना नहीं. वो न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग भला क्यों करेंगे. वो अपने खेत से बस उतना ही अनाज उगाते हैं, जिससे उनका पेट पल जाए. क्योंकि पूरे खेत पर लागत की व्यवस्था उनके चादर से बाहर पैर पसारने जैसी है. महंगे बीज, उर्वरक, सिंचाई के लिए बिजली या डीजल भी बेतहाशा महंगे, जुताई भी महंगी. ये सब करने के बाद बाढ़ आ गया या फिर सूखा पड़ गया तो लागत भी गई और फसल भी. ये सड़कों पर हंगामा करने वाले बड़के किसान हैं. कम जमीन वाले किसान तो बाज़ार भी तभी जा पाते हैं जब कोई त्योहार हो.

बस ये समझ लीजिए कि किसान के हर कदम पर कांटे हैं. अब इतना बदहाल कर दिया आपने फिर भी किसानों के हमदम बनते फिर रहे हो. किसान फांसी के फंदे पर एवैं नहीं झूल जाता होगा. पिछले तीन दशकों में भारत में पांच लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या कर लिया. किसान इतने धैर्यशाली होते हैं कि वो जल्दी बेसब्र नहीं हो सकते हैं. बल्कि तमाम संघर्षों का दामन पकड़ जिंदगी बिताते हैं. उनकी आत्महत्या सरकारों के पुरुषार्थ नहीं नपुंसकता का जीता जागता प्रमाण हैं.

24 सितंबर की डायरी से!

कमरे के घुप्प अंधेरे से मानो संधि कर लेना चाहता है मन कि अब उजाले के तिलिस्म में मत ले जाना. उन उजालों से भरोसा उठ चुका है. इस घने काले अंधेरे में मन की व्यथाएं कुछ हद तक शांत हो जाया करती हैं. फिर मन का एक तंतु घर पहुंच जाता है. अम्मा के पास. सोचता हूं कि काश कि वो मेरे पास होतीं. मां के साथ होना, कितना सुखद होता है. वो लगातार मुझे इन उलझनों से निकल जाने को कहती हैं. क्यों घर की चिंता करते हो? पापा करेंगे ना सब! वग़ैरह. दो पल को तो मेरा भी जी चाहता है कि अम्मा की बात मान लूं. फिर जब समाजशास्त्र के बारे में सोचता हूं तो मन ये फैसला नहीं ले पाता. मैं अपने जीते जी किसी पड़ोसी को ये कहते नहीं देख सकता कि बेटे तो अपनी ही दुनिया में मदमस्त हो गये. घर की तो उन्हें चिंता ही नहीं रही. जब घर पर था. तो ये सुन सुनकर उकता गया था मैं. पापा भले सभी परिस्थितियों से वाकिफ रहते और सब जानते. लेकिन इन उलूल जुलूल बातों में अक्सर चिंतित रहा करते. ये सब मेरी आँखों के सामने घटित हुआ है और मेरे मन में गहरे जाकर बैठा हुआ है. इसलिए मैंने अपनी प्राथमिकता में घर-बार को शामिल कर लिया और खुद को बाहर.

ये मेरे लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है. लेकिन मेरे बिचले बाबा से मैंने एक चीज़ सीखा है कि जब बात उसूलों की आए तो जान पर भी बन आए तो भी पीछे मत हटो. ये जिंदगी बहुत बड़ी है. इसमें सुख दुःख क्षणिक हैं. देर तक रहेंगे तो घर के लोगों के वो अरदास जो उनके मुझसे जुड़े हैं और मेरे उनसे. मैं बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे की तरह अपने पुरखों को अनपढ़ तो नहीं कह सकता. मेरे पुरखे मुझे जो भी सिखाए वो मेरे लिए जीवन प्रतिपादन की वस्तुएं हैं और रहेंगी. इन साहेब को ये तक नहीं पता कि अनपढ़ कबीर की लाइनों पर पीएचडी की जाती है लेकिन इनको तो ये साबित करना है कि इनके खानदान में सर्वप्रथम शिक्षाशास्त्री यही बनें. हमने रिश्तों को बांधने में हमेशा यही चूक की है. कि उसकी हैसियत देखने बैठ गये. उसकी आभा देखने बैठ गये. उसका महत्व देखने बैठ गये. किसी से हाथ मिलाते समय ये कभी ना सोचें कि वो आपके लिए कैसा है! हमेशा रिश्ते बनाते समय मन में संकल्प करें कि आप उसकी बेहतरी के लिए मुस्तैद रहेंगे.

भगतसिंह का नशा बनाम सुशांत सिंह का नशा!

जब आप सुशांत सिंह राजपूत मामले में ऐसी अवधारणा बना के चल रहे हैं कि उनका इस्तेमाल हुआ तो आप कहीं ना कहीं उनके इंजीनियर दिमाग पर कमजोरी का धब्बा लगा रहे हैं. क्योंकि इस्तेमाल कोई उसी का कर सकता है, जिसमें इस्तेमाल या शोषण करने वाला शोषित होने वाले से तेज दिमाग का हो. आप कह रहे हैं रिया ने सुशांत को अपने काबू में कर लिया? नहीं ये भी बातें अब सामने आने लगी हैं कि सुशांत खुद ड्रग का सेवन करते थें.

क्या आपके सुशांत ने ड्रग का सेवन करने से पहले ये पूछा था कि उनके चाहने वाले लोगों को जब पता चलेगा कि वो चरसी हैं तो लोगों को कैसा लगेगा. लेकिन अगर आज जब ये बात खुलकर सामने आ रही हैं तो ये समझने की कोशिश कीजिए कि उसने ड्रग लेते समय आपकी फिक्र और भरोसे को ठेंगे पर रख दिया. अब ये बात भी विवेचना के लायक है कि क्या ड्रग लेने के लिए उन्हें बाध्य किया गया? तो फिर रिया को ड्रग लेने के लिए किसने बाध्य किया!

दरअसल, होता क्या है कि जो लोग ड्रग या किसी भी नशे का सेवन नहीं करते, उनके लिए तो ये अनैतिक है. लेकिन जो इन नशों के आदी हैं, उनका ये शौक है. शौक जिंदगी बनाने और बिगाड़ने, दोनों तरह का हो सकता है. मनोदशाएं सबकी थोड़ी-बहुत खराब हो सकती हैं, इसका ये कतई मतलब नहीं बनता कि आप अपने परवरिश में मिले निर्देशों को भूल बैठे.

अच्छा मुझे समझाइए कि क्या भगतसिंह के देशप्रेम के नशे से ज्यादा नशीला हो सकता है कोई भी ड्रग, शराब या जो कुछ भी लोग इस्तेमाल कर रहे हैं. कितना भी बड़ा पियक्कड़ या नशाखोर क्यों ना हो! उसके गले में फांसी का फंदा डाल दीजिए और फिर कहिए कि इंकलाब जिंदाबाद बोल के दिखा दे. उसका सारा नशा उतर जाएगा. वो अपनी जिंदगी की भीख मांगने लगेगा. तो नशा करना हो तो भगतसिंह की तरह देशप्रेम का नशा कीजिए, और उन जैसे युवाओं से प्रेरणा लीजिए. क्योंकि सुशांत सिंह राजपूत के जीवन में अगर एक भी सिद्धांत जिंदा बचा रह गया होता तो वे ड्रग कभी नहीं लेते. ड्रग पार्टियां आयोजित नहीं करवाते.

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