चीन के सू यून का डाॅगी जान ले सकता था!

चीन के यूनान प्रांत में रहने वाली सू युन और उनके परिवार को एक कुत्ता पालने की चाहत थी। और एक दिन सू युन का परिवार बाजार से एक छोटे कुत्ते के पिल्ले को घर ले आया, लेकिन बाजार में उन्हें कुत्तों के ज्यादा प्रकार नहीं दिखे थे और जो कुत्ते थे उनमें कोई खास बात नहीं थी। इसके बाद बाजार में सू युन को एक प्यारा नन्हा पिल्ला दिखा, उसे देखते ही तुरंत उनका दिल आ गया। पूरे परिवार को नन्हा पिल्ला पसंद आया और उसे खरीदकर घर ले आए।

सू युन की फैमिली ने कुत्ते खरीदने से पहले उसके नस्ल के बारे में दुकानदार से पूछा। तब दुकानदार ने बताया कि पिल्ला मास्तिफ़ प्रजाति का है। ये सुनने के बाद फैमिली को लगा कि इस कुत्ते में कुछ खास बात है। फैमिली को कुत्ते में काफी कुछ खास बातें दिखीं। आइये जानते हैं, क्या थी वो खास बातें…

2 बाल्टी पास्ता और 1 पेटी फल खाता था
पिल्ले को जब फैमिली ने घर लाया तो देखा कि, कुत्ते को बहुत भूख लगती है। वह रोज करीब 2 बाल्टी पास्ता और 1 पेटी फल खा जाता था। फैमिली को ये बात तो पता थी कि, कुत्ते को भूख लगती होगी, लेकिन उन्होंने इतना खाने वाला कुत्ता कभी नहीं देखा था।

कुत्ता भौंकता नहीं, बल्कि चिल्लाता था
इसके बाद सू युन के परिवार ने देखा कि, कुत्ता बहुत अजीब तरीके से चिल्लाता  है। उन्होंने कुत्तों से इस तरह की आवाज कभी नहीं सुनी थी। फैमिली ने बताया कि, उस कुत्ते की आवाज सुनकर कभी ऐसा नहीं लगा जैसे वो भौंक रहा हो। बल्कि कुत्ते की आवाज से लगता था, जैसे वो किसी चीख रहा हो। कुत्ते के ऐसे अजीब व्यवहार देखकर परिवार वाले भी थोड़े डर गए थे, लेकिन सू युन और उनकी फैमिली जानती थी कि कुत्ता स्पेशल है, इसलिए उन्होंने उसको खूब प्यार किया और उसकी देखभाल में भी कोई कमी नहीं की।

एक दिन कुत्ते ने की अजीब हरकत
एक दिन परिवार वालों ने देखा कि, कुत्ता अपने आप खड़ा हो गया। चूंकि किसी ने भी उसे खड़ा होना नहीं सिखाया था, इसलिए इसे देखकर सब आश्चर्य करने लगे। इसे देखकर परिवार वालों ने सोचा कि या तो इसने खुद सीख लिया होगा। या फिर उसकी नस्ल कि, ये खूबी होगी।

कुत्ते के वजन और ऊंचाई ने सभी को हैरान कर दिया
परिवार ने उस कुत्ते का नाम प्यारा ‘छोटू ब्लैकी’ रखा था। वह जमकर खाना खाता था, इसलिए वह बहुत तेजी से बड़ा हो गया। 2 साल की उम्र में ही कुत्ता 1 मीटर ऊंचा हो गया और वजन 110 किलो बढ़ गया। पिल्ले की ऊंचाई और वजन बढ़ता देख सू युन हैरत मे पड़ गए। उनके दिमाग में ये सवाल आने लगा कि, कोई कुत्ता इतनी तेजी से कैसे बड़ा होगा?

कुत्ते में दिखी चिंतित करने वाली बात
न सिर्फ वजन और ऊंचाई बल्कि उसके दांत भी लगातार बड़े हो रहे थे। कुछ दिनों बाद वो कुत्ता नहीं, बल्कि किसी शिकारी जानवर की तरह दिखने लगा। इन सभी चीजों को देखकर परिवार काफी चिंतित हो गया। उनके दिमाग में ये आने लगा कि, एक कुत्ता पालने की कीमत कहीं जान गंवाकर तो नहीं चुकानी पड़ेगी।

परिवार ने समय रहते बड़ा कदम उठाया
अब कुत्ते के मालिक यानी सू युन जानवरों के डॉक्टर के पास पहुँचे। डॉक्टर देखते ही समझ गया कि, ये कुत्ता नहीं बल्कि कोई और ही जानवर है। डॉक्टर ने बिना देरी किए यिलियांग काउंटी पब्लिक सिक्योरिटी ब्यूरो वालों को बुलाया। इसके बाद इस ब्यूरो को फैमिली ने बताया कि, ये दो बाल्टी पास्ता और एक फलों की पेटी बड़े आराम से खा लेता है। साथ ही परिवार ने उस जानवर के दांत भी दिखाए और बताया कि ये ज्यादातर दो पैरों में खड़ा होता है।

ये कुत्ता नहीं बल्कि…
आपको जानकर हैरानी होगी कि वो कुत्ता नहीं बल्कि खतरनाक काला एशियाई भालू था, यिलियांग काउंटी पब्लिक सिक्योरिटी ब्यूरो  के अधिकारी आए और इस भालू को अपने साथ ले गए। IUCN के अनुसार इस जानवर के कई नाम हैं। इसे लोग कॉलर बेयर, मून बेयर या तिब्बती भालू भी कहा जाता है। IUCN ने इसे लुप्तप्राय प्राणी की श्रेणी में रखा है। इस भालू के अधिक शिकार होने की वजह से इसकी संख्या अब काफी कम हो चुकी है।

दादी मां और उनकी राजकुमारी की कहानी!

हमारी बड़ी दीया की विवेकशीलता हम सभी से कहीं ज्यादा बेहतर है. बड़ी दी के शादी के साल मैं महज 10 साल का था और 5वीं में पढ़ता था. हमारे तीन बाबा के घराने में नूतन दी सबसे बड़ी पौत्री हैं. ऐसा नहीं है कि मेरे उनसे झगड़े नहीं हुए या वो लंबे समय तक मुझसे खफा नहीं होती लेकिन उन्हें मेरी परवाह नहीं थी, रही या होगी.. इसका सवाल ही नहीं उठता है. पापा, कुसुम बुआ और ब्यूटी दी में एक समानता है. ये तीनों लोग बहुत जल्दी भावुक नहीं होते, जितना हो सकता है अपने को मजबूत रखते हुए छोटों को समझाने की कोशिश ही करते दिखते हैं.

ब्यूटी दी जिस दिन आपकी विदाई हो रही थी, आपके जाने के बाद मैंने पिताजी की आंखों को आंसुओं से भरा देखा. शायद अपने जीवन में मैंने पहली बार अपने पापा को ऐसे भावुक होते देखा. वो समय, जब भैया वाराणसी चले गए और फिर दिल्ली आये. ब्यूटी दी पापा के बेटे की भूमिका में ही रहीं. पापा कोई भी मशविरा करना होता, कोई पुरानी जानकारी या वाकया सब दीदी को याद रहता. जैसे घर बनाना हो, या घर में कोई सामान लेना हो. पापा कहते कि – तोहने मूर्ख हवा, ब्यूटिया बताई ठीक से! या वो के पता होई.

कभी-कभी तो ब्यूटी दी से ईर्ष्या भी होती कि पापा हमसे क्यों नहीं पूछते कि घर पर कौन सा काम होगा या नहीं. अब लगता है कि हम उस काबिल थे ही नहीं. दीदी की शादी के कुछ साल पहले ही घर में बंटवारा हुआ. मैंने पहली बार अनुभव किया था कि मेरी दादी मां जिस परिवार के जिम्मेदारियों का बोझ कई दशकों से ढोती चली आ रहीं है. उसमें एक धड़ा चंद कागजी टुकड़ों के सामने उस बोझ को हल्का कर देगा. मैंने अपनी आंखों से अपनी दादी के संघर्षों को देखा है और जिया भी है.

ब्यूटी दी और दादी यानी बड़की माई के बाॅन्डिंग की बात ही निराली थी. ब्यूटी दी को बड़की माई बहुत मानती. कहतीं ईहै त हमार राजकुमारी बांटी. ब्यूटी दी की विदाई और उससे पहले हुए घर के बंटवारे के बाद दादी बीमार रहने लगीं. वजह साफ था कि कुछ लोगों की मनमर्जियों के एवज में उनके सपनों का घर तितर-बितर हो गया था और उनकी राजकुमारी अपने ससुराल विदा हो गई थी. आप हर जन्म में हमारी बड़ी दीया बनना. राखी की शुभकामनाएं दी!

काश! तुम अपने पिता से जुड़े रहते सुशांत…

वे महिलाएं जो रिया चक्रवर्ती की तरह सिर्फ़ पैसों के लिए प्यार में आती हैं, उन्हें क्या पता कि पैसा सिर्फ अशांति का कारण बनता है. वाकई पैसा आपको सभी सुविधाओं से भर देगा. विलासिता के सभी मानकों तक पहुंचाएगा लेकिन यही एक दिन आपको चैन से जीने नहीं देगा. बताइए उस पिता पर क्या गुजर रही होगी. जिसने अपने इकलौते बेटे से कभी एक रूपये का हिसाब नहीं मांगा. आज मरने के बाद उसे एफआईआर में बताना पड़ रहा है कि रिया और उसके भाई ने तमाम मदों में सुशांत से पैसे भी लिए और तथाकथित आत्महत्या या हत्या के कुछ दिन पहले नंबर तक ब्लाॅक कर दिया.

कितनी मौकापरस्त होतीं हैं रिया जैसी महिलाएं. लेकिन सुशांत को तो सोचना चाहिए था कि उनके जाने के बाद उनके पिताजी का क्या होगा? जिस रिया चक्रवर्ती पर सुशांत ने करोड़ों रूपये फूंक दिए आज उसे सुशांत को इंसाफ दिलाने की जरा सी भी फ़िक्र नहीं है. वो सुप्रीम कोर्ट अर्जी लेकर चली गई कि इस मामले को सीबीआई ना देखे. अगर रिया की कोई साजिश नहीं है तो वो क्यों डर रही है? जिंदगी भर जो मां बाप आपके लिए इतना कुछ करते हैं, उनको एक पल में भूल जाने की कैसी रवायत बन चली है. उनके अरमान इतने महंगे नहीं होंगे. वो तो बस इतना चाहते हैं कि मेरा बेटा जहां रहे कुशल रहे. खैर, रिया चक्रवर्ती से ज्यादा फिक्रमंद तो सुशांत की एक्स गर्लफ्रेंड अंकिता लोखंडे दिख रही हैं जो सुशांत को इंसाफ दिलाने के लिए मुस्तैद हैं. सुशांत तुमने सुसाइड करके उस पिता की मुश्किलों को बढ़ा दिया है, जिसे तुम्हारी मनमर्जियों के एवज में मौकापरस्त रिया चक्रवर्ती से अपने इकलौते बेटे के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़नी पड़ रही है.

सारे मर्द एक जैसे नहीं होते!

फेमिनिज्म के मुंडेर पर बैठी वो महिलाएं आज चुप हैं, जो एक पुरूष की विकृतियों को समूचे मर्द जमात पर चस्पा कर देती हैं और बड़े आराम से कह देती हैं कि सारे मर्द एक जैसे होते हैं. एक जैसे नहीं होते सारे मर्द और ना ही महिलाएं एक जैसी होती हैं.

फेमिनिज्म के पाखंड का अधिष्ठाता कौन है. आपका फेमिनिज्म बार-बार महिलाओं को कमजोरी का प्रतीक बनाने का अनूठा धंधा बन कर रह गया है. जहां महिलाओं के प्रति सहानुभूति हासिल करने का ही टारगेट होता है. क्या आज रिया चक्रवर्ती के तथाकथित दोषों को पूरी महिलाओं के माथे मढ़ देना चाहिए. गजब का पैटर्न सेट होता जा रहा है लेखन के वटवृक्ष के नीचे. जो हमारे हिसाब का और अनुकूल है. उस पर हमें ज्ञान बघारना है लेकिन अगर उसके खिलाफ कोई भी यथार्थ जीवंत हो जाए तो आपकी घोर चुप्पी ही आपके सेलेक्टिव टाॅपिक का बुरा हश्र कर देता है.

तो गौर से सुन लो 21वीं सदीं की/के नारिवादियों! सारी औरतें एक जैसी नहीं होती. इस भरोसे के साथ कि तुम्हारे मुंह से निकलने वाला वो वाक्य सारे मर्द एक जैसे होते हैं, बंद होगा.

प्रशांत कोठारी सर: जिनकी क्लास में आप कभी बोर नहीं हो सकते!

((आधुनिक दौर के छात्र लंबे पाठ्यक्रम और परंपरागत टीचिंग स्टाइल से बोर हो जाते हैं, इस पीढ़ी के मेंटर ऐसे होने चाहिए जो दोस्त सरीके हों और आपको क्लास के बाहर भी ये एहसास ना होने दें कि वो आपके दोस्तों से अलग हैं. ऐसे मानकों में फिट बैठने वाले मेरे एक ही टीचर हैं, और उनका नाम प्रशांत कोठारी है.))

हम लोगों को ITMI में डिजिटल जर्नलिज्म समझाने के लिए प्रशांत सर को जिम्मेदारी दी गई. हमने कायदे से डिजिटल जर्नलिज्म तो सीखा ही साथ में एक ऐसी क्लास भी नसीब हुई, जिसमें टीचर दोस्त के किरदार में रहते. उनकी आर्ट आॅफ टीचिंग का मैं मुरीद हूं. प्रशांत सर का पढ़ाने का वो तरीका और बीच-बीच में बेवजह सबके चेहरों को मुस्कराहट की सौगात देने की कला वाकई में सबसे जुदा है.

मानव, व्यवहार से तीन तरह की क्रियाओं को अपनी स्मृतियों में देर तक रोकता है. ये तीनों हैं – मानिया, फिलिया और फ़ोबिया हैं. और इन तीनों का अनुभव हमने प्रशांत सर की क्लास में भरपूर किया. मानिया यानी लगाव बनाने की तरकीबें. जैसे अगर हम हिस्ट्री की क्लास में होते हैं तो हमें इंसान होने के नाते अपने मुल्क के अतीत को जानने में दिलचस्पी होती है और हम उसके लिए मानिया इंसानी गुणधर्म में तरबतर हो सकते थे. लेकिन सर की क्लास में जर्नलिज्म या किसी भी तरह की हिस्ट्री या कहानी नहीं थी. तो प्रशांत सर विषय को रोचक बनाने के लिए उसे किसी कहानी में तोड़ देते. या समझाने की कोशिश में मानिया का घोल डाल देते. दूसरा फिलिया यानी इश्क़. एक बार मास कम्यूनिकेशन वालों के ज्यादा क्लासेज की वजह से और साथ ही बचे सिलेबस को पूरा कराने के लिए गेस्ट फैकल्टी के टीचर आए और इसके एवज में हमें करीब तीन हफ्ते तक सर की क्लास के अभाव में रहना पड़ा. बहुत दिन बाद जब सर की क्लास लगी, तो हम सर की क्लास के लिए काफी उत्सुक थे. तीसरा फोबिया यानी डर. सर डराते भी थे. अब आप पूछेंगे कि मगर वो कैसे? तो जवाब ये है कि सर कभी भी अचानक टेस्ट ले लेते और सारे आग्रहों का गला घोंट देते.

ये बात तो हुई शिक्षण कला की. मैं जितना समझ सका उस हिसाब से प्रशांत सर के तमाम क्लास हमें डिजिटल जर्नलिज्म से ज्यादा नामुमकिन चट्टानों पर हथौड़ा मारने के गुर सिखाते रहे. जी हां, वो एक कुशल मोटिवेशनल स्पीकर भी हैं. एक दिलचस्प वाकया सुनाता हूं, जो मेरे जीवन का सबसे उत्प्रेरक मोड़ तैयार करता है. प्रशांत सर ने सबको एक टाॅपिक पर कंटेंट बनाने और उसे डिजिटल माध्यमों पर प्रमोट करने का असाइनमेंट दिया था. मुझे कोई विषय समय नहीं आया. जब भी ऐसा होता है कि मुझे कुछ सूझता नहीं तो मेरे पास सिर्फ तीन जवाब सूझते हैं. कलाम, गांधी और विवेकानंद. इस बार मैंने कलाम के जरिए अपने कंटेंट को ढूंढने की कोशिश की थी. मुझे लगा कि घोर सैद्धान्तिक हो रहा हूँ कहीं खाली हाथ ना लौटना पड़े. लेकिन मेरे हाथ एक प्रासंगिक विषयवस्तु लग ही गई. विषय था- ENERGY CONSERVATION IN REFERENCE OF 21ST CENTURY.

अपने एक स्पीच में कलाम ने कहा था कि 2020 में हम दुनिया के विकसित देशों के जितना ऊर्जा उत्पादन करेंगे. जिसका नाम उन्होंने मिशन इक्विटी 2020 रखा. मुझे लगा कि कलाम का इतना सम्मान करने वाला देश उनके मरने के बाद कम से कम उनके सपनों को अपनी आंखों में जरूर रखेगा. पीयूष गोयल उस साल ऊर्जा मंत्री थे. उन्होंने दो साल में मिशन इक्विटी के लिए कुछ भी नहीं किया था. मीडिया के लोग भी कलाम के सपनों को भूल चुके थे. ये बातें मैंने प्रशांत सर को बताई. प्रशांत सर ने सुनने के बाद साफ और स्पष्ट जवाब दिया था ‘पकड़ो पीयूष गोयल को’. मुझे पहली बार ऐसा लगा कि अपने मजबूत कंटेंट के ज़रिए आप किसी को भी घेर सकते हैं. आजकल यही नहीं हो पा रहा. या यूं कहिए कि बहुत कम ऐसा कुछ हो पा रहा है. जिस दौर में प्रधानमंत्री का भाषण ही हेडलाइन बनता हो. उस समय अतीत के ये उत्प्रेरक अनुभव बौद्धिक ओज से भर देते हैं.

आखिर में बस इतना ही कि ऐसे प्रशिक्षक और क्रियान्वेषी मार्गदर्शक ही नये युग की शुरूआत की नींव खड़ा कर सकते हैं. मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे आपका सान्निध्य मिला, उम्मीद रहेगी कि हमें अनवरत ऐसे ही विचारदीर्घा से अभिभूत करते रहे. चरण स्पर्श!

ये कौन सा दयार है!

ये कौन सा दयार है!


शहरयार ने लिखा, खय्याम ने म्यूजिक दिया. आशा ने गाया और रेखा ने उमराव जान को फिर से जिंदा कर दिया. वाकई में फिल्म उमराव का ये गाना सुनने के बाद मन के अंतसों से एक सुरीला सवाल बार-बार अपने जवाब के लिए उम्मीद बरकरार करने की कोशिश तो करता है लेकिन हम जैसे लोगों को बेज़बान कर देता है. ये कौन सा दयार है?

वाकई में सच्चे प्यार में उतरने के बाद लोग किस जगह और कौन से दयार में रहते हैं. मेरे हिसाब से वो दुनिया एकदम से अलग होती है. गम और ख़ुशी का ऐसा सम्मिलन इस दयार में ही मुमकिन हो पाता है. मेरी जितनी समझ विकसित हो पाई है, उस हिसाब से ये एक ऐसी जगह होती हैं, जहां पहुंचने के बाद कुछ याद नहीं रह जाता.

सबरी को कहां याद था कि बेर जूठे हो रहे हैं. सुदामा भी तो भूल गए कि काख में दबाई चावल की पोटली ही प्रेम का सबसे बड़ा दयार है. राधा भी कहां कह पाई उद्धव से कृष्ण के वियोग में इस दयार तक पहुंचने की बातें. आदर्श प्रेम के ऐसे बहुतेरे दयार हैं, जिनको बताना और समझना साधारण लोगों के बस की बात नहीं.

अशोक वाटिका में बैठी सीताजी की राम स्वरूप देखने की अभिलाषा प्रेम का दयार ही तो है. जो अधूरा तो है, लेकिन उसका अनुमान करके भी प्रेमी मन को जितनी खुशी मिलती है! उसे वही समझ सकता है. मीरा का विष पीकर नाचते जाना, उस दयार को ही पा लेना है. जिसे पागलपन कह के दुनिया हंसने के सिवाय और कुछ नहीं कर पाती.

गोस्वामी तुलसीदास जब लाश पर बैठकर नदी पार कर जाते हैं, और उन्हें पता ही नहीं चलता कि ये नाव नहीं है. वो भी उसी दयार में ही प्रविष्ट कर चुके होते हैं. दशरथ माझी इसी दयार में पहुंचकर पहाड़ का सीना अपने हथौड़े और जिद्दी प्रेम के बल पर चीर देता है. मातृभूमि के इसी प्रेम दयार में पहुंचकर भगतसिंह जैसे हजारों सपूत अपने जान की बाजी तक लगा दिए.

कहने का मतलब ये हुआ कि जब भी आपकी आंखों के सामने कुछ अविश्वसनीय और नामुमकिन जैसा हो रहा हो तो समझ लेना चाहिए कि प्यार का कोई अनाम दयार अपने वजूद की गांठें खोल रहा है.

धन्यवाद!

ITMI संस्मरण: दिल नाउम्मीद तो नहीं ! ‘विशाल शर्मा’

((विशाल भाई से आपकी असहमतियां हो सकती हैं, लेकिन किसी भी मनमुटाव को रखने के लिए उनके विशाल ह्रदय में कोई जगह नहीं होती. वो फ़िक्र के मुंडेर पर बैठे ऐसे सारथि हैं, जिन्हें अपने साथ के लोग अर्जुन जैसे लगते हैं.))

मैंने ऐसे बहुत कम लोग देखे हैं, जिन्हें बरबस ही अपने साथ रहने वालों का फ़िक्र हो. विशाल शर्मा मेरे ITMI के दौर के एक ऐसे मित्र हैं, जिनका नाम लेते समय मन में आदर जैसा भाव भर जाता है. क्योंकि वो हर संभावनाओं को उड़ने के लिए प्रेरणा देते और हम लोगों के दायित्वों को किसी ऐतिहासिक शख्सियत का नाम लेकर जिम्मेदारियों का दायरा और अधिक बढ़ा देते.

विशाल भाई से हुई एक मीटिंग की बातें साझा कर रहा हूँ- अभिजीत, बिना सिद्धांत और मूल्यों के चलते जाना आपको बड़ा बना सकता है, ऊंचा कभी भी नहीं. कोई बार-बार अपने सिद्धांतों से समझौता करके जिंदा तो रह सकता है, लेकिन अपना व्यक्तित्व नहीं बचा सकता. इसलिए जब भी कुछ करना अपने सिद्धांतों और मूल्यों को बचाए रखना. थोड़ा मुश्किल है लेकिन मुझे लगता है कि तुम जैसे चंद लोग मुझे कभी नाउम्मीद नहीं करोगे.

विशाल भैया हजारीबाग, झारखंड के हैं, तो उनका हालचाल पूछने का वो लहजा मुझे बहुत ही पसंद आता. मुस्कराहट के साथ ‘और अभिजीत कैसा है, तू आजकल दिखाई नहीं दे रहा. कहां रहता है भाई’. फिर तो मन कितना भी गमगीन हो. खुशी से लबरेज हो जाता.

हम लोगों को इंस्टीट्यूट से दशहरा पर एक एवी तैयार करने का असाइनमेंट मिला था. विशाल भैया नेहरू प्लेस के पास जिस मैदान में रावणदहन देखने जाने का प्लान बनाए थे. वहां रावण को समय से पहले ही जला दिया गया. फिर लोगों से पूछने पर पता चला कि पास ही में एक और रावण जलाया जाना है. चलकर किसी तरह हम वहां पहुंचे थे. ऐसा लग रहा था मानो रावणदहन कवर नहीं कर रहे हैं, एवरेस्ट फतह कर लिया है.

खान अब्दुल गफ्फार खान के भाई जब्बार खान के नाम पर बना दिल्ली का मशहूर खान मार्केट, जाने का प्लान तरूण ने किया और साथ में विशाल भैया भी थे. इतना मजेदार अनुभव रहा कि पूछिए मत. खान मार्केट 1951 में बना था और यहां 154 शाॅप हैं. यू शेप में बने इस मार्केट की खासियत आप तभी जान पाएंगे, जब यहां घूमने के दौरान इसके बारे में रोचक जानकारियां देने वाला विशाल भाई की तरह कोई साथ में हो.

आखिर में बस इतना ही कि विशाल भैया के साथ बिताया हर लम्हा खास बन जाता है. ईश्वर से आपकी कुशलता और उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ.

‘अपना गम़ लेके कहीं और ना जाया जाए’

अपने ट्विटर हैंडिल से अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने कुछ समय पहले निदा फाजली की एक गजल शेयर की थी. जो उनकी हैंडराइटिंग में है. मेरा मानना है कि किताबों से प्यार करने वाला कोई भी इंसान सुसाइड तो कर ही नहीं सकता. सुशांत के सुसाइड के पीछे उनका असंतोष क्या था, ये तो जांच का विषय है. लेकिन ये गजल लिखने और उसे साझा करने की गतिविधि से जाहिर है कि सुशांत खुद को मोटिवेटेड रखने की तमाम कोशिशें कर रहे थे.

जहां तक फिल्म इंडस्ट्री में कुछ प्रवर्गों को विशेष महत्व देने की बात है तो ये कोई बड़ी बात नहीं है. लेकिन सुशांत सिंह के अभिनय को दरकिनार करने का साहस इनमें से कोई प्रवर्ग कभी नहीं कर सकता. उनके अभिनय के सामने सभी सिर झुका चुके हैं. फिल्म इंडस्ट्री को ये कोशिश करनी होगी अब फिर से कोई अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की तरह गलत कदम ना उठाये.

वैसे सुशांत पर कमजोर होने का टैग ना लगाइए तो ही ठीक है, क्योंकि सुसाइड तो चंद्रशेखर आजाद ने भी किया था लेकिन वो कमजोर बिल्कुल भी नहीं थे. आजाद भारत मां के सत्साहसी पुत्रों में एक थे. मैं मानता हूं कि सुशांत की परिस्थितियां और आजाद की चुनौतियां बिल्कुल मेल नहीं खाती. लेकिन मानसिक उलझनों का कोई सिरा नहीं होता.

हम सबके भीतर एक भारी कमी है कि हम सुधारवाद के जनक बनने लगते हैं. और दूसरों को बार-बार तोड़ने की लगातार कोशिशों में जुटे रहते हैं. दोस्तों किसी का साहस दूना नहीं कर सकते तो कम से कम उसे कम तो ना करो. जब कोई आस पास ऐसा दिखे तो उसे हिम्मत दो, हौसला दो. उसे बताओ कि काम इंसान के जज्बे से बड़ा नहीं हो सकता.

सबके भीतर ये ऐब पनपता जा रहा है. मैंने देखा है कि लोग समूह में आकर रणनीति के तहत आपके हौसले को तोड़ने की कोशिश करते हैं. मैं इस मानसिक अवनति का पुरजोर विरोध करता हूं. खैर सुशांत, अगर आपको भी इन सारी चीजों से गुजरना पड़ा हो या मन में कोई असंतोष था. तब भी ये कदम नहीं उठाना था. भारत में करोड़ों लोग कमाए थें आप. ये कम संपदा तो नहीं. देश में धोनी को जिस तरह तुम अजरामर कर गये, उसके बाद सभी तुम्हारे अभिनय के मुरीद बन गए थे. तुम्हारी सुसाइड की जो भी वजह रही हो लेकिन ये कदम उठाकर बहुत सदमा दिया है यार.

ITMI संस्मरण: गजब.. सर गजब और इंटरव्यू ख़त्म!

बरेली, भगवान शिव के ऐतिहासिक मंदिरों से घिरा हुआ शहर है. नाथ संप्रदाय के क्रियान्वयन में महती भूमिका निभाने वाले इस शहर को नाथ नगरी भी कहते हैं. रामगंगा नदी अनवरत इस नाथ नगरी के पांव पखारने की भरपूर कोशिशों में लगी रहती है. आला हजरत का मशहूर दरगाह और नवजागरणकाल के प्रसिद्ध समाज सुधारक ज्योतिबा फुले के नाम से बनी यूनिवर्सिटी इस शहर की विशेषताओं के अंग हैं. इसी मशहूर शहर में वेब जर्नलिस्ट और मेरे एक दोस्त तरूण अग्रवाल का पैतृक निवास है. तरुण के साथ बिताए बहुत सारे खास लम्हें हैं, लेकिन इनमें से चंद यादों का अनुकूल बिंब रचते हैं.

मैंने ITMI में सबका नंबर फोन में फर्स्ट नेम और फिर ITMI लिखकर सेव किया था, ऐसा इसलिए भी कि जाति ना पूछो साधु की पूछ लीजिए काम. तो लाजमी तरुण का भी नंबर TARUN ITMI नाम से ही सेव किया. शुरूआत में तरूण को क्राइम जर्नलिज्म में खास दिलचस्पी हो गई या कोई खास वजह नहीं पता लेकिन एक दिन उसने मेरा फोन लिया और झटपट अपना नाम मेरे सेलफोन में क्राइम जर्नलिस्ट तरूण के नाम से सेव कर दिया.

क्राइम जर्नलिज्म के पीछे का फितूर ये था कि बंदा शम्स सर के क्लासेज़ से ज्यादा प्रभावित हो गया, ऐसा मुझे लगता था. तरूण को वेब जर्नलिस्ट की संज्ञा इसलिए भी दे दिया क्योंकि तरूण, मयंक, भोजक और विशाल शर्मा समेत हम लोगों ने न्यूज़बाजार नाम से एक वेबसाइट बनाई और काफी हद तक उसे चलाने में सफल भी रहे. इसमें सबसे ज्यादा कोशिशें तरूण अग्रवाल की ही रहीं.

यूपी में शिक्षामित्रों की नियुक्ति में धांधली और समस्याओं पर काफी रिसर्च कर तरुण महाराज इसी केस के वकील का इंटरव्यू करने पहुंचे. मैं और मयंक भी साथ थे. वकील बोलते गये, बोलते गये… तरूण बीच में हामी भरते चले जा रहे हैं. जब वकील साहेब अपनी बात पूरी कर लिये. तो तरूण की वो लाइन आज भी हास्य के उद्दीपन बिखेर देती है.. गजब.. सर गजब! बमुश्किल वकील साहब के रूम तक तो हम दोनों किसी तरह अपनी हंसी रोक पाए लेकिन बाहर आकर ठहाकों की गूंज ऐसी पसरी कि पेट दर्द करने लगा.

आखिर में तरुण के बारे में बस इतना ही कि वो एक नेक व्यक्तित्व और रोमांचक आदमी है. उसके साथ घूमना हमेशा मजेदार रहता. खान मार्केट, जामा मस्जिद और बहुतेरी जगहें जहां हमारा दोस्ताना अभी भी जीवंत है. इसी तरह जीवन में नये मुकाम हासिल करते रहो, खूब शुभेच्छाएं..

3 जून की डायरी से

सोचा था इस बार सैलरी बढ़ेगी तो पापा के लिए कार लूंगा फिर धीरे-धीरे किश्त चुकाता रहूंगा लेकिन सारे अरदास धरे के धरे ही रह गये. पापा ने जीवन भर हमारे लिए और घर के लिए किया, कभी अपने बारे में सोचते ही नहीं हैं. पापा को रिटायर हुए भी चार साल हो गये. लेकिन आज भी घर बार के चक्कर में उलझे हुए हैं. कहीं जाना होता है तो धूप सहते हैं.

पापा ने जिन लोगों के लिए अपनी गाढ़ी कमाई लगा दी आज वे ही उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी बन कर सामने खड़े हैं. ऐसे लोग ही मुझे कई दफा नैतिकता का पाठ भी पढ़ाते रहते हैं. खैर, कुछ भी करने के लिए नीयत साफ होना चाहिए. दिन तो हमने ऐसे-ऐसे देखे हैं जिसके सामने आज का ये संघर्ष बड़ा अदना नज़र आता है. इतिहास साक्षी है कि जिन लोगों ने भी ईमानदार प्रयास का विरोध किया, उनके हाथ कुछ भी नहीं लगा. वैसे इस साल नहीं सही, अगले साल. लेकिन ये जरूरी और सहज अरमान भगवानजी जरूर पूरी कर देना! 😊🧡

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