एक ‘अज्ञानी’ प्रधानमंत्री के भरोसे मत बैठिये!

2014 के बाद भारतीय राजनीति आस्था का विषय बना दी गई है. अनहद भक्तियुग! कोई प्रधानमंत्री के झूठे दावे के खिलाफ नहीं बोलेगा? नहीं तो उसे गालियाँ दी जाने लगेंगी. उनके अतार्किक और अज्ञानी बातों पर सवाल उठा दे तो उनके समर्थक जान से मारने की धमकियाँ देंगे! एनडीए सरकार की विफलताओं पर बोलने पर लोग उसे सोशल मीडिया पर ट्रोल करेंगे और तमाम तरह से परेशान करना शुरू कर देंगे. देश गर्त में जा रहा है लेकिन कोई आवाज़ ना उठाये. ये लोकतंत्र है और बतौर भारतीय नागरिक हम अपनी सरकार से सवाल पूछने के लिए प्रतिबद्ध हैं और पूछेंगे भी!

युवाओं को देश की समस्याएं जाननी होंगी और उसके समाधान की तरफ़ कोई कदम उठाना होगा. हमें एक प्रधानमंत्री के भरोसे नहीं बैठना चाहिए और ऐसे प्रधानमंत्री के भरोसे जो ज्वलंत विषयों पर गंभीरता नहीं दिखाता बल्कि बहुसंख्यक आबादी को अपने खेमे में मिलाने के लिए तमाम संप्रदायों में बिखरी भारतीय अस्मिता को कपड़े से पहचानने की बात करते हैं. 35 साल तक भिक्षा मांगकर जीवन यापन करने की बात करेंगे. एक युवा भिक्षा मांगे; ये उचित नहीं है. उसकी आत्मा में अगर जरा सा भी जीवन शेष होगा वो काम करेगा.

सैंकड़ों वीडियो ऐसे मिल जाएंगे जिसमें पीएम मोदी खुद कहते हैं कि हाईस्कूल से ज्यादा पढ़ाई नहीं हो पाई लेकिन अमित शाह उनके सर्टिफिकेट पर पीसी करने जरूर आएंगे. विश्व स्वास्थ्य संगठन कह रहा कि किसी पारंपरिक दवा को वो सर्टिफाई नहीं करेगा. लेकिन कोरोनिल के प्रचार के लिए हमारे दो कैबिनेट मंत्री मुस्तैदी के साथ उसका विज्ञापन करेंगे.

नाली के गैस से चूल्हा जलाने वाले प्रधानमंत्री पर स्पूफ बने तो लोग आगबबूला क्यों होते हैं. वायुमंडल के गैस से पानी बनाने वाले पीएम पर विज्ञान युग उपहास क्यों नहीं कर सकता. बादल घिरने पर रडार काम नहीं करेंगे किसी भौतिकविद् से ये बात पच सकती है. बच्चों को परीक्षा पर टिप्स देनी है लेकिन खुद का जीके इतना कबाड़ बना दिए हैं उसपर कोई सवाल करे तो उसे देशविरोधी घोषित कर देंगे.

राष्ट्रवाद की अफीम का नशा होता ही ऐसा है कि सब कुछ लुटते हुए भी लोगों को हकीकत पर भरोसा नहीं होता. भारतीय अर्थव्यवस्था की जो वर्तमान स्थिति है; वो बेहद चिंताजनक है. बेरोजगारी की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ. वो दिन दूर नहीं जब भारत सरकार का रवैया ब्रिटिश हूकूमत की तरह ही दिखेगा. अखबार उठाकर पढ़िए, लगेगा रामराज्य आ ही गया है लेकिन जब आप उस व्यवस्था का जायजा खुद करने जाएंगे तो सब कुछ फरेब लगेगा. सभी दावे झूठे लगेंगे. सभी सरकारी नीतियों के विज्ञापन धोखेबाजी करते नज़र आएंगे.

दुनिया जिसे कहते हैं!

जो लोग दुनिया की जानकारियों की समझ विकसित कर लेते हैं; उन्हें एक समय बाद राष्ट्रीय समस्याओं में उतनी दिलचस्पी नहीं रह जाती. क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ होने के बाद देश के मुद्दे गौण लगने लगते हैं. या यूँ कहे कि राष्ट्रीय मुद्दों से आपका सरोकार और दिलचस्पी धीरे-धीरे घटने लगती है. आज एक बहुत ही दिलचस्प खबर आई ट्यूनीशिया से. जहाँ पर एक डाॅक्टर अस्पताल में मरीजों को हिम्मत और हौसला बनाये रखने के लिए वायलिन बजाकर सुनाते हैं. वायलिन की धुन सुनने के बाद कैंसर और कोरोना के दोहरी मार को झेल रहे मरीज खिलखिला उठते हैं. ऐसा लगता है मानो उन मरीजों को; जो जिंदगी से नाउम्मीद हो चुके हैं, दवा से भी जरूरी वायलिन की धुन की जरूरत है. दुनिया को ऐसा ही होना चाहिए. दूसरों के काम ना आ सकें तो फिर इंसान होने का फायदा ही क्या है?

चुनाव में हार के बाद अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति पहली बार किसी कार्यक्रम में शिरकत करने जा रहे हैं, लेकिन ये अमेरिका के लोकतंत्र की ही शक्ति है कि उनके भड़काऊ बयानों के लिए उनके अपने लोग भी उनसे खफा होकर बैठे हैं. ईरान भी कमाल का देश है! अमेरिका से परमाणु समझौते को लेकर असहमति को आज यूएन के न्यूक्लियर चीफ पर निकाल दिया. मानिटरिंग की मकसद से लगाए उनके सर्विलांस कैमरे को दो बार बंद किया गया. इससे साफ जाहिर है कि ईरान के राजनेताओं की अमेरिका से किस हद तक ठनी है. अमेरिका को बार बार धमकियाँ देने वाले टर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन के रुख में भी नरमी देखने को मिली, अब वे भी अमेरिका के साथ मिलकर आगे बढ़ने की मंशा दिखा रहे हैं.

अमेरिका में बंदूक को ट्रंप प्रशासन ने खिलौना बनाकर रख दिया था. जब से बाइडेन राष्ट्रपति बने हैं; बेतहाशा बंदूकें खरीदने पर सख्ती दिखा रहे हैं. जिसके चलते आज न्यू आर्लियंस के एक गन स्टोर में ही हमला हो गया. क्रॅस फायरिंग में हमलावर तो मारा गया लेकिन दो लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी. वहीं; 2017 से गृहयुद्ध झेल रहे अफ्रीकी देश नाइजर में आज राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान हुआ. अमीर देश सर्बिया के पास आज चार तरह की वैक्सीनें उपलब्ध हैं. स्पुतनिक, सायनोफार्म और फाइजर की तो पहले ही मंगवा चुके थे; आज वहाँ के राष्ट्रपति एलेक्जेंडर वुसिक खुद एयरपोर्ट पहुँच एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन का जायजा लेने पहुंचे थे.
आज आस्ट्रेलियन ओपन में नोवाक जोकोविच 9 वीं बार चैंपियन बनकर मेन्स सिंगल्स का खिताब अपने नाम किया.

मुझे लगता है कि भारत के युवाओं की संकीर्ण सोच को विकसित करने और बेकार के घरेलू मुद्दों में उलझनें से बेहतर है कि वे विश्व नागरिक बने और दुनिया को जानने की कोशिश करें. मेरा दावा है कि अध्ययन और अनुभव दोनों मजेदार होगा!

21 फरवरी की डायरी से


मुझे नहीं मालूम कि माया का फंदा किसको फांस रहा है और कौन इसकी चपेट से बाहर है; लेकिन अपने जीवन और इससे मिले अनुभवों से इतना जरूर जान गया हूं कि विषय-विकार सब पर हावी है. किसी चीज़ की कामना ही विषय विकार है; और सोचिए कौन यहाँ उससे बच सका है? किसी की कामना संपत्तियों के लिए है तो कोई नाम और शोहरत के लिए बेचैन है. किसी को अच्छा जीवनसाथी चाहिए तो कोई सर्वेसर्वा बनने की होड़ में लगा है.

गीता में लिखा है कि लोग इसी माया के फांस से बाहर नहीं निकल पाते. और खुद को साधारण घोषित कर देते हैं. ये मेरा भोगा हुआ अनुभव है. विशेष व्यक्ति सिर्फ किसी पद प्रतिष्ठा पाने के बाद घोषित नहीं किया जाना चाहिए और ना ही किसी अनुभव के आधार पर. कोई विशेष या महान तब माना जाये जब उसके पास विषय विकार से दूर रह सकने की कुशलता मिल जाये. महान या विशेष व्यक्तित्व वही बनाया जाए जो काम, क्रोध, मद, लोभ के प्रभाव में ना आता हो.

जिसके जीवन में सिद्धांत और मूल्यों के लिए भरपूर जगह हो. और इन्हीं रास्तों पर चलने वाले लोगों का अनुकरण किया जाए. मुझे पूरा भरोसा है कि जिस रोज लोग संतोष, सब्र और धैर्य के हथियार से कामनाओं का वध करने वाले बन जाएंगे; उस दिन कहीं अपराध नहीं होगा. किसी राज्य में कोई भूखा नहीं सोयेगा. सभी सुखी; संपन्न और समृद्ध बन जाएंगे. जिस रामराज्य की हम हजारों साल से परिकल्पना कर रहे हैं; वो हमारी आंखों के सामने वास्तविकता की परिधि कर लेगा.

शुभरात्रि!

ये जो ‘टूलकिट’ है!

विरोध के स्वर लोकतंत्र के लिए जरूरी होते हैं और जो हमारा संविधान है, उसमें आलोचना करने की पूरी छूट दी गई है. अगर आप टूलकिट को लेकर परेशान हैं तो सोचिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी ब्रिटिश हुकूमत की ज्यादतियों के खिलाफ एक खास रणनीति यानी टूलकिट बनाई थी. पत्रकार गांधी ने भी चंपारण में तीन कठिया का विरोध किया था, और नील की खेती के खिलाफ गांधी की आवाज़ में बहुतेरे लोग शामिल हुए. वो देश के लोग भी थे और विदेश के लोग भी थे. मानता हूँ कि तब देश गुलाम था और मनमर्जियों का सितम इस कदर भी नहीं था. लेकिन सोच के देखिए कि भारत में आर्थिक गुलामी का माहौल बनता नहीं दिख रहा है. किसानों का बिल और उनके आंदोलन को कुछ समय के लिए नजरअंदाज़ कर लीजिए मगर उसके अलावा भी अगर आप भारत की अर्थव्यवस्था से जरा भी पढ़ते या समझते होंगे तो आपको ये बताने की जरूरत बिल्कुल भी नहीं है कि; देश की आर्थिक स्थिति आज बद से बदतर हो चुकी है.

महंगाई बढ़ती जा रही है लेकिन मीडिया के पास सरकार को डिफेंस करने के अलावा कुछ सूझता ही नहीं. खेतीबाड़ी पर कार्पोरेट कंपनियों के नियंत्रण से स्थितियां भले कुछ दिनों के लिए सुधर जाएं लेकिन आगे जाकर निश्चित तौर पर मुश्किलें खड़ी होंगी. अगर सरकार किसानों का हित चाहती है तो उन्हें उनके अनाज का उचित दाम दिलवा दे. जमाखोरी और बिचौलियों को खत्म करने का कोई ठोस कदम उठाये. ये कानून तो जमाखोरी को और बढ़ावा देने वाले ही हैं. गरीब अमीर के बीच जिस खाई को पाटने के लिए आर्थिक बजट तैयार होता था; उसमें गरीबों के उत्थान का कोई जिक्र ही नहीं है.

ग्रेटा थनबर्ग और दिशा रवि दोनों पर्यावरण को बचाने और जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दों की लड़ाई लड़ रही हैं. अगर व्यक्तिगत तौर पर उन्हें इस कानून से आपत्ति है तो भी उन्हें इस तरह गिरफ्तार करना न्यायसम्मत नहीं है. सरकारों की आलोचना हर दौर में हुई है और होती रहेगी. वो विष्णु के अवतार नहीं हैं कि उनके खिलाफ बोलना सही नहीं.

भारत में समस्या इस बात की है कि युवावर्ग लंपट है. वो विषय को पढ़े लिखे बिना ही तर्क करने बैठ जाता है और किसी भी मुद्दे पर अवधारणा बना लेता है. उसे भरपूर अध्ययन की जरूरत है. पीएम मोदी से प्रेम कीजिये लेकिन उन्हें भगवान तो मत बना दीजिये. कि उनके खिलाफ किसी की आवाज़ उठने पर आप भारत दुर्दशा पर भी चुप बैठे रहे. ये देश रहेगा तो बहुत सारे प्रधानमंत्री बनेंगे. अगर देश के स्वाभिमान और मूल्यों से खिलवाड़ हो तो हम सबका दायित्व है कि उसके खिलाफ आवाज़ बुलंद करें. ये ना देखें कि भीड़ उनके साथ है. बल्कि ये देखें कि उचित और राष्ट्र हित में क्या है!

शुभरात्रि…

राजनीतिक प्रवक्ताओं की फूहड़ भाषा और संवाद-प्रहरी!

भाषा, साहित्य और संवाद के लोगों से तो शब्द-मर्यादा की उम्मीद रहती ही है. फिर कोई संवाद का आदमी प्रतिवाद और हस्तक्षेप पाकर अपना आपा खो बैठे तो फिर क्या कहा जाए. राजनेताओं और अभिनेताओं ने तो भाषा को रसातल में फेंक ही दिया है पर लेखकीय समुदाय तो इसकी गरिमा को बचाए रखे. लोक व्यवहार में अगर कहीं भाषायी सौंदर्य में अक्खड़पन हो तो उसे भी लिखा जाना चाहिए जैसेकि काशीनाथ सिंह ने कासी के असी में किया है. पर व्यक्तिगत तौर पर तो कम से कम अपनी गरिमापूर्ण व्यक्तित्व और पेशे का खयाल तो रखना ही चाहिए. जो लोग शब्द पर काम करते हैं, वे देवी सरस्वती के उपासक माने जाते हैं. उनके मुखारबिंद से किसी के लिए अपमानजनक बातें शोभा नहीं देतीं. हस्तक्षेप और वाद-प्रतिवाद तो पत्रकारिता के साजो-श्रृंगार होते हैं. राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता लाइव डिबेट में अपना असली चेहरा यदा-कदा प्रकट करते ही रहते हैं. हाथापाई की भी नौबत आ ही जाती है. ये भाषायी संकुचित का सबसे बड़ा उदाहरण है. प्रवक्ता और नेता की शोभा उच्चकोटि की भाषा से होती हैं. अनर्गल और स्तरविहीन बातें उनके पद को म्लान करती हैं. हालांकि टीवी डिबेट में ये तौर तरीके प्रवक्ताओं के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं क्योंकि ज्यादातर लोग टीवी पर ड्रामा ढूंढ़ते हैं. उन्हें इन कारनामों पर हास्य की अनुभूति मिलती है जिसे वो खोना नहीं चाहते. यही कारण है कि संवाद का प्रहरी यानी एंकर जानबूझकर ऐसी नौबत आने देता है.

रोने की आदत मनुष्य के विकासवाद को रोक देती हैं!

आशाओं के तिनकों से जो आशियाने बनाये गये वो कभी धराशायी होकर भी ताश के पत्तों की तरह नहीं बिखरे, वो बहुत देर तक वहीं पड़े रहे. जैसेकि एक अच्छी परवरिश कभी आपको गलत रास्तों पर जाने नहीं देतीं. जब हम अपने परवरिश के मीनार पर आशाओं को आकृति देना शुरू करते हैं ना तो कुछ अद्भुत कलाकृति बनकर निकलती है. इंसान पत्थर से मिलकर तो बना नहीं है कि उसे तकलीफ़ का असर नहीं होता और उसकी वेदना पर घात की गई चोटें नहीं उकरतीं.

रोना तो मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है; लेकिन इसे छोड़ देने की जरूरत है. आजकल लोग रुदन को व्यक्तित्व की कमजोरी समझ लेते हैं. कौन सा महापुरुष आंसू के शबनम से मुखभाग को नहीं सींचा है. तो फिर रोना कमज़ोर होने का प्रमाणीकरण कभी नहीं हो सकता. फिर भी रोने की जरूरत नहीं. क्योंकि जिसे हम अपना भाई; पिता या रिश्तैदार समझ के नाउम्मीद होने पर रो बैठते हैं. वो सिर्फ एक आदमी है. जिसे अपनी अहमियत के अलावा कुछ नहीं भाता. उस पर माया और मोह की बंदिशों का अतिक्रमण है. इसलिए उन सबके लिए अपने मोती जैसे अश्रु बहाना कदापि उचित नहीं ठहराया जा सकता.

लोग अपने अप्रतिम से बिछड़ते वक्त भी दुखी होते हैं; और कुछेक तो इस कदर की चिल्ला चिल्लाकर रो पड़ते हैं. उन्हें भी किसी यात्रा पर निकलने वाले अपने प्रिय को इस तरह विदा नहीं करना चाहिए. अशांत मन की यात्राएं जिज्ञासाविहीन होती हैं और जिस यात्रा में जिज्ञासा मर जाए, उसका मकसद कभी पूरा नहीं होता. यात्राएं हमारे मन उद्दीपन का दीया होती हैं. उसके जलने से हमारे भीतर आशावाद का संचार होता है. इसलिए विदाई के समय निरर्थक रोना भी उचित नहीं.

कलाकार विश्व नागरिक होते हैं!

कलाकार किसी देश के नहीं होते, वो सीमा रेखाओं में नहीं समाते. उनके चाहने वाले सीमाओं के पार के भी होते हैं! कलाकार विश्व नागरिक होते हैं. अभिनय, संगीत का कुछ ऐसा तारतम्य है कि जहां मन बिंध गया; उसे ही अपना बना लेता है. क्या पाकिस्तान; अमेरिका, क्या कोरिया; क्या जापान. आज जो लोग किसानों के आंदोलन पर विदेशी कलाकारों को उनकी हदें बता रहे हैं. उन्हें अपनी विचार सीमाओं को और विकसित करने की जरूरत है. कोरोना महामारी के वक्त जब दुनिया में हौसले की कमी महसूस हुई. दुनिया भर के संगीतकारों ने एक स्वर में उम्मीद भरे गाने गाये. उसमें रिहाना भी थी और इससे जो फंड इकट्ठा हुए; वो किसी एक देश में स्वास्थ्य बहाली के लिए नहीं खर्च हुए. उन पैसों ने सीमाओं को तोड़ लोगों की परेशानी दूर किये.

मिया खलीफा पर भद्दे मीम बनाने और घटिया सोच रखने वाले खुद का आत्ममंथन करें और ये जरूर सोचे कि मिया खलीफा ने भले ही अपने जिस्म का सौदा कर दिया हो लेकिन अपनी आत्मा की नीलामी तो नहीं कीं. महीनों से आंदोलनरत किसानों के हित में बोलना उनके दयाभाव को प्रदर्शित करता है. पाकिस्तान में बलोचों पर अत्याचार होता है तो दुनिया थूकती है ना! तो अगर आज खेती किसानी में बाजारवाद का मुहाना खोलते समय किसानों को अपने हित की चिंता सता रही है तो कोई जरूरत नहीं उनके वजूद का तुल्यांकी भार निकालने की.

अगर आप अच्छा करेंगे तो दुनिया जिंदाबाद के नारे लगाएगी और अगर आप बुरा करने की सोचेंगे तो जो जागरूक लोग हैं; उन्हें सच की तरफदारी करनी ही होगी. अमेरिका में ब्लैक लाइव्स मैटर्स हैशटैग से कौन पत्रकार अछूता रहा. तो क्या जार्ज फ्लायड की निर्मम हत्या अमेरिका का आंतरिक मामला भर था. कोई भी मुद्दा अंतरराष्ट्रीय तब बनता है जब वो देश अपनी नीतियों की रक्षा करने में असफल हो जाता है.

सीमाओं के पार झांकना आत्मविश्लेषण और आदर्श स्थितियों की सुदृढ़ीकरण के लिए कच्चा माल तैयार करता है. इसलिए किसी भी व्यक्ति को सीमाओं से नहीं चर्चित विषयों पर जागरुकता की जानकारी हासिल करने की परिधि से जानिए. धन्यवाद

2 फरवरी की डायरी से

इंसान बहुत सारी चीजों को चुपचाप इसलिए भी स्वीकार कर लेता है कि उसके पास कोई विकल्प नहीं होता, वो निहायत मजबूर होता है. जिस माँ बाप ने आपको इस काबिल बनाया हो कि आप अपना अच्छा बुरा समझने के लायक बनें; जब उन्हें आप की जरूरत महसूस हुई तो आपने उनसे दूरी बना ली और उस दूरी का नाम रख दिया नौकरी. हम मिडिल क्लास और छोटे शहरों के लोगों के साथ ये समस्या बहुत मामूली है. दिन रात अपनी कोशिकाओं का पूरा जोर लगाकर भी आप इस लायक ना हो सकें कि अपने माँ बाप की बढ़ती उम्र में देखभाल कर सकें तो लानत है ऐसी क्षमता और पेशे पर. करीब पांच साल से मीडिया इंडस्ट्री में काबिज हूँ; लेकिन अभी तक इतनी हैसियत नहीं हो पाई कि माँ पापा को अपने बूते साथ रख सकूं. ऐसे मौके भी आते हैं जब आर्थिक तौर पर उन्हीं पर निर्भर रहना पड़ता है.

मैं अपने पापा को अब फैसले लेते हुए नहीं देखता तो मन मसोस उठता है. जिनकी एक बोल से घर पर सबकी सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती थी आज वो उम्र के इस पड़ाव में सबकी बातों को चुपचाप स्वीकार लेते हैं. एक पुत्र के तौर पर मैं पापा के व्यवहार के हमेशा करीब रहा हूँ. पापा ने बहुत प्रेरक और ईमानदार जीवन बिताया. घर बार को लेकर अपना सब लुटाते गये. जो अपने दिमाग का बेजां इस्तेमाल किये वे आज उन्हें अपने पैसे का धौंस आसानी से दिखा सकते हैं. लेकिन उनकी कर्तव्यनिष्ठा और समर्पण के सामने बहुत अदने मालूम पड़ते हैं.

आज परिस्थितियों के विपरीत होने पर सभी अपनों का चेहरा साफ-साफ दिख रहा है. सब के सब बस अपने फायदे और मौके को भुनाने के लिए पापा के पास आते थे. अगर सही में ईश्वर का अधिवास इस धरती पर है तो बस उससे इतना मांगने की जुर्रत करूँगा कि मेरे पापा और माँ को स्वस्थ और कुशल रखे; बदले में मुझे जो कुछ तकलीफें दे सकें; सहर्ष स्वीकार कर लूंगा.

मेरे घर का बंटवारा!

बात 2003 की है. ये वही साल था; जब मेरे घर में ज्ञात पीढ़ियों में पहली बार बंटवारा हुआ था. मेरी उम्र उस समय नौ साल की थी. मुझे थोड़ा धुंधला ही सही लेकिन सब याद है. नवंबर का महीना था. अगले साल मई के महीने में ही मेरी बड़ी बहन यानी ब्यूटी दीदी की शादी होने वाली थी. हमारे तीन बाबा थे. जो हमारे थे; उनको तो सिर्फ तस्वीरों में ही देख सका. बाकी दो लोगों में एक बिचले बाबा जिनका जिक्र मैं यदा-कदा अपनी डायरियों में करता रहा हूँ; वे थे. और सबसे छोटे बाबा मुंबई में रहते थे. सबका जिक्र शुरूआत में इसलिए कर दे रहा कि आपको पूरा वाकया समझने में आसानी हो.

तड़के सवेरे बिचले बाबा कचहरी जाने के लिए अपना बैग उठाये ही थे. तभी मेरी बड़की माई यानी बड़ी दादी उनके लिए चूड़ा;दूध-चीनी का हल्का नाश्ता लेकर पहुंचती हैं. अमूमन; बिचले बाबा अपनी बड़ी भाभी की किसी बात को कभी ना सुने ऐसा होते मैंने देखा ही नहीं, लेकिन उस रोज बाबा ने कुछ भी खाने से इंकार कर दिया था. माई फिर भी बिचले बाबा से ये कहकर अंदर चली गई. कि बिना खाये घर से ना निकले.

ये तीसरा दिन था जब एक मामूली विवाद के बाद घर में चूल्हा नहीं जला था. विवाद था; घर में दो चूल्हे बनाने को लेकर. बड़की माई ने इस बात से साफ इंकार कर दिया था. लेकिन बिचले बाबा पर दोनों पक्षों से लगातार दबाव बनाये जा रहे थे. शायद इसी तनाव को लेकर उस रोज भी बिचले बाबा नाश्ता करने से इंकार कर रहे थे.

खैर; बिचले बाबा से हम सभी डरते बहुत थे. लेकिन उनके गुस्से और दुलार का सामंजस्य इतना सहज था कि उनके पास जाने में कभी हिचकते नहीं थे. बिचले बाबा ने दो चम्मच भी खाया नहीं था कि मेरी नज़र उस पर चली गई. मैंने बाबा से बस इतना ही कहा- बाबा भूख लगल बा हो. और वे पूरी कटोरी मुझे थमा बैग उठाकर कचहरी निकल गये. बड़की माई तभी अचानक अंदर से आ गई. और उन्होंने बाबा का नाश्ता मुझे खाते हुए देख लिया. मैं कुछ समझ सकता कि वो गुस्से से भर गई. तोहने के कुछ ना मिलत हवे. ओनके अगवै क मिलल हवे. मैंने उनसे कहा कि माई तीन रोज से कहाँ कुछ बन रहा. जो हल्का फुल्का बनता है; उससे भूख नहीं जाती. दादी भावुक हो गई लेकिन उनका गुस्सा शायद अब भी खत्म नहीं हुआ था!

वो अमूमन कभी हाथ नहीं उठाती थी और पापा जब गुस्से में मेरी पिटाई करने आते तो वही बचाती भी थी. लेकिन शायद अपने लाडले देवर के भूखे होने की वजह से वो मुझ पर भड़के जा रही थी. उन्होंने मुझे उसी ताव में एक तमाचा दे मारा. मैंने चूड़े और दूध से भरी कटोरी बैठक में दे फेंकी. तभी अम्मा आ गयी. अम्मा; माई को अम्मा ही बुलाती थी. उन्होंने पूछा- अम्मा का भयल हव. उन्होंने कहा- बिचलकू के आगे क खायल दुश्वार कैले हवे तोहार पूत. शाम के समय घर में माई ने सबको हटाकर बहुत दिनों बाद रसोई की शोभा बढ़ाई और हम सबने छककर खाना खाया.

दूसरे दिन सुबह दिग्विजय राय के पिताजी घर आये. उन्होंने पापा और छोटे बाबा को बिठाकर समझाया कि आपके घर का क्षेत्र में बड़ा नाम है. और लोग आपके परिवार सरीखे बनने की कोशिशें करते हैं. जो भी मतभेद हैं; उन्हें भुलाकर और मिलकर रहिए. पापा ने अगले साल दीदी की शादी की वजह से उनकी बातों को स्वीकार कर लिया लेकिन छोटे बाबा ने कहा सभी लोग एक में रहेंगे तो मैं एक रुपया भी खर्च नहीं करूंगा. पापा ने इस पर भी हामी भर दी. लेकिन शाम को छोटे बाबा ने गुंजन भैया को गाय की देखरेख ना करने की वजह से बहुत डांटा और मारे भी; जिसपर अम्मा ने कह दिया कि आपके जो मुंबई वाले पोते हैं; उनसे करवा लीजिए कभी.

फिर क्या था; उस रोज मुंबई वाले बाबा के परिवार ने अलग खाना बनाया खाया. बड़की माई की आंखें उस रोज ऐसे भरभरा रही थीं मानो कि उनसे किसी ने उनका सर्वस्व छीन लिया हो. इस घोंसले को उन्होंने तिनका-तिनका चुनकर तैयार किया था; जो आज पूरी तरह बिखरा पड़ा था.

हमें नाज़ है अपने गांधी पर!

बीजेपी की गोडसे समर्थक सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने कई बार बापू पर आपत्तिजनक बयान दिया है. बीजेपी को आज तक इन बयानों पर खेद जताने का समय नहीं मिल सका. जबसे प्रधानमंत्री मोदी आम चुनाव में जीतकर आए हैं. भारत के महान व्यक्तित्वों को सरेआम बदनाम करने की नापाक कोशिशें जारी हैं.

कोई पंडित नेहरू को अनाप शनाप बोलकर निकल जाता है तो कोई महात्मा गांधी को. क्या साध्वी प्रज्ञा ठाकुर भारत की आजादी में गोडसे की भूमिका को लेकर एक लाइन भी बताने का माद्दा रखती हैं. अगर नहीं तो एक राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी का ये दायित्व नहीं बनता कि वो अपने संसदीय सदस्य से उसकी गलतबयानी पर खेद जाहिर करवा सके.

दरअसल, गोडसे को पार्टी अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे में फिट पाती है, इसलिए उस बयान का खुलकर विरोध करने से बचती रही है. दक्षिण अफ्रीका में गांधी और मंडेला के अलावा कौन वैश्विक पटल पर किर्तिमान बनाने वाला नेता बचता है? अगर आप गांधी के विरोध में कुछ कहने के लिए खुद को स्वतंत्र पाते हैं तो ये स्वतंत्रता गांधी ने ही आपको दी है किसी गोडसे ने नहीं!

भारतीय राजनीति में ऐसा दौर कभी नहीं आया जब एक महापुरुष के लिए आपत्तिजनक शब्दों के बाद भी अपने पद पर काबिज बना रहा हो. हमें नाज़ होना चाहिए उस गांधी पर जिसने औपनिवेशीकरण और समाजवाद के खिलाफ दुनिया में जागरूकता फैलाई. हमें फक्र होना चाहिए गांधी के उस राष्ट्र प्रेम पर जिसने जब एक बार ठान लिया कि स्वदेशी का कपड़ा नहीं पहनूंगा तो मरते दम तक अपने हाथों से बनाई धोती ही पहना. गांधी जिंदाबाद थे; हैं और हमेशा रहेंगे…

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