‘रोशनदान’

प्रधानमंत्री मोदी! आपने नागरिकराज के लोकतांत्रिक अस्तित्व पर हमला किया है. गंगा के किनारे बसे वाराणसी को जीतने के लिए आपने कहा था- मुझे तो माँ गंगा ने बुलाया है. आज वही गंगा माँ अपने बेटों के शवों से पट गयी हैं. सनातन का पाखंड करने वाले आपके चापलूस सीएम योगी ने निर्ममता की सारी हदें पार कर दी हैं. जिन स्वाभिमानी हिंदुओं ने मध्यकाल में मुगलों की बर्बरता पर भी धर्म परिवर्तन नहीं किया; आज उन्हें मजबूर होकर लाशों को दफनाना पड़ रहा है. इस तरह आप धर्म की रक्षा करने में भी नाकाम हुए हैं.

समूचे भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं में भारी कमी से मास मर्डर का खुला खेल जारी है. कायदे से तो महामारी में चुनाव कराना ही गलत है, लेकिन आपकी भी संवेदना मर गयी और आप लाशों पर राजगद्दी की मनसा नहीं छोड़ पाए. पूरी दुनिया आज भारत पर थू थू कर रही है. क्या ये है आपका राष्ट्रवाद. इस देश में आखिर ऐसी स्थितियां क्यों बनाई गई. हालत ये है कि कोरोना की टेस्टिंग की सुविधाएं भी पूरे भारत में उपलब्ध नहीं हैं.

चीन अपने नागरिकों से ना तो टेस्टिंग का पैसा लेता है; और ना ही इलाज का. इससे पहले जब वहाँ सार्स महामारी आई थी तो उसने उसका भी डटकर सामना किया. सही समय पर अस्पतालों और स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करके उसने अपने लोगों की जानें बचाई. क्या भारत, चीन की तरह इस महामारी का सामना नहीं कर सकता था. इस महामारी में आपके सिस्टम ने लोगों को तबाह करके रख दिया है.

आपको शर्म आनी चाहिए कि आप उस धरती पर पैदा हुए हैं जहाँ एक पक्षी को मारने पर गौतम बुद्ध राजद्रोह पर उतर आये थे, वाल्मीकि ने क्रौंच के एक जोड़े को मारने के बाद निषाद को श्राप दे दिया था. एक गाय की जान बचाने के लिए राजा दिलीप ने सिंह के सामने खुद को पेश कर दिया. दरअसल, असलियत ये है कि आप सनातनी होने का सिर्फ ढोंग करते हैं. प्रधानमंत्री मोदी लोग कोरोना से नहीं, आपके नाकामी की वजह से मारे जा रहे हैं. चलिए, इतना बता दीजिये कि आपकी निष्ठुरता को देखने के बाद कितने लोगों ने आपसे मदद मांगी है. आप पर लोगों ने भरोसा करना छोड़ दिया है.

सोनू सूद आखिर कैसे सबको फ्री सुविधाएं देने में सक्षम हो गये और पूरा तंत्र होने के बाद आप लाशों को तमाशबीन होकर देखते रह गये. इस महामारी में स्वास्थ्य मंत्री इतने नाकारा साबित हुए हैं कि पूछिए मत! टेस्टिंग, ट्रीटमेंट और वैक्सीनेशन के लिए हर जगह लंबी कतारें हैं. भारत सरकार देश में दस हजार कोविड अस्पताल नहीं बनवा सकती. वो प्राइवेट अस्पतालों पर क्यों निर्भर होने को मजबूर है. जहाँ पर इलाज के नाम पर मनमानियाँ जगजाहिर है. लोग अपने प्रियजनों को खोने के बाद भी कर्जदार बन गये हैं.

आपदा में अवसर का तो खुला खेल ही चल रहा है. सभी अपनी जेबें भरने में लगे हुए हैं. लाशें ढोने के लिए लगे एंबुलेंसों की भारी कमी है. लोग एंबुलेंस के अभाव में खुद लाशें ढोने पर मजबूर हो रहे हैं और अगर एंबुलेंस मिल भी रही है तो लोगों को मुंहमांगी कीमत देने के बाद. अपनी लेटलतीफी से आप भारत का बेड़ा गर्क कर चुके हैं.

COVID19

रोशनदान! (22 अप्रैल की डायरी से)

इंसान की जीने के लिए जो बेचैनी है, वो बेइंतहा है! मरने के बिलकुल नजदीक पहुँचकर भी वो जीना नहीं छोड़ता. सब समझ बैठे हैं कि जीये जाना ही सबसे बड़ी हकीकत है लेकिन ये समझ सही नहीं है. सबसे बड़ा सच है मृत्यु. हम इस हकीकत से कभी इनकार नहीं कर सकते. श्रीमद्भागवत गीता में कृष्ण बार-बार अर्जुन को यही समझा रहे हैं कि तुम सिर्फ एक जरिया बनोगे. सबको जन्म और मृत्यु देने का अधिकार तो मुझे है. चूंकि गीता एक धार्मिक ग्रंथ ही नहीं बल्कि भारत के कानूनी प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली किताब है; इस नाते भी इसकी प्रामाणिकता से किसी को गुरेज़ नहीं होना चाहिए.

कोरोना या किसी भी रोग से मरने वाले लोग अपनी स्वाभाविक मृत्यु को नहीं प्राप्त करते हैं. वो उस संक्रमण से तड़प तड़प कर मर जाते हैं. जिस देश में हर साल 6 लाख लोग मलेरिया से मर जाते हैं वहां कोरोना से उचित लड़ाई का दंभ फिजूल है. हालात ये है कि संक्रमण तेजी से फैलता जा रहा है और सिस्टम लापरवाहियों का पुलिंदा बनता जा रहा है.

चीन में 2011 में सार्स फैला; सार्स के कुछ मामले इटली में भी आए. आप चीन को कोरोना के लिए कोसते रहिए लेकिन इसी चीन ने उस समय सार्स से लड़ने के लिए राजधानी समेत कई प्रमुख शहरों में हजारों बेड के अस्पताल चंद दिनों में बनाकर खड़े कर दिए. जिससे अन्य रोगियों की जान पर ना बन आये. हमें इतना सुनहरा मौका मिला लेकिन भारत सरकार ने उसे गवां दिया. वो अपने सिर का ठीकरा कुछ गैर बीजेपी शासित राज्यों पर फोड़ती रही. लेकिन किसी वैश्विक महामारी में केंद्र सरकार की भूमिका प्रमुख होती है. उसकी जिम्मेदारी होती है कि वो स्वास्थ्य सुविधाओं और आगामी चुनौतियों का डटकर सामना करे.

हम सोशल कैंपेन के भरोसे कितनी जानें बचा पाएंगे और कब तक? इसके लिए कोई मेगा प्लान सरकार को लाना ही पड़ेगा और अगर इतने त्राहिमाम को देखने के बाद भी भक्ति कायम है तो भगवान बचाये!!!

पापा का स्नेह-मीमांसा!


पापा काॅलेज से आज जल्दी आ गये. जाने क्या जुनून था कि भरी बारिश में ही शहर निकल गये. हमारे यहां किसी के कहीं जाने पर टोकने को अशुभ करार कर दिया जाता है. फिर भी अगर आपके पिता बरसात रुकने तक का इंतज़ार नहीं कर रहे हैं, तो मन में स्वस्थ जिज्ञासा जाग ही उठती है. जाने से पहले मैंने पूछ ही दिया, कहाँ जा रहे हैं. बारिश में. दादी बिगड़ गई. कहने लगी कि फिर टोक दिये. पापा मुस्कराते हुए निकल गये. दादी से मैं इस विषय पर देर तक चर्चा करता रहा. मैंने उनसे पूछा कि बड़की माई क्या आपको पापा बताकर गये हैं कि कहाँ जा रहे. उनका भी जवाब नहीं मिला.

ब्यूटी दीदी आई, तो उन्होंने भी यही कहा कि बारिश रुकने पर नहीं जा सकते थे. कौन सा पहाड़ टूट गया कि थोड़ी देर रुक नहीं सकते थे. वग़ैरह… यही सब बातें हो रही थीं. थोड़ी देर बाद गोल्डेन भैया बारिश में ही धान के खेतों में पानी रुकने के लिए मेढ़ों को देखने के लिए निकल गये. बिचले बाबा भी जब शाम के समय बगीचे से लौटे तो हम लोगों से पूछने लगे कि ‘करे जनार्दन गाड़ी लेकर कहाँ निकलने हय बरिसिये में’. तनु दी ने जवाब दिया- ‘बाबा केहू के बता के ना गइने हय. बंटवारे के बाद बिचले बाबा भले रहते उन लोगों के साथ थें, लेकिन उन्हें हम सबकी परवाह रहती थी.

तभी पापा लौट आये. कपड़ा बदलने और पानी चाय करने के बाद पापा ने कहा- विश्वजीत को पैसे भेजने गया था. अगर आज नहीं जाता, तो लड़का परेशान होता. पापा हमें सामने से कभी प्यार नहीं जताते लेकिन हमारे लिए स्नेह की अनुपम और कच्ची डोरियों को हमेशा थामे रहते हैं.

‘रोशनदान’- बदलाव की उम्मीद के साथ!

भारत में बहुत जल्द कोरोना के डेली केस एक लाख के पार हो जाएंगे लेकिन भारत सरकार का पूरा जोर विधान सभाओं को जीतने में दिख रहा है. आज भारत में 93 हजार से अधिक कोरोना केस सामने आए हैं. हमारे प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचारों में अपने ही कोरोना के खिलाफ दिए नारे ‘दो गज की दूरी, मास्क है जरूरी’; की धज्जियां उड़ा कर रख दी है. ऐसे में अवसरवादी सरकारों की पहचान करने की जरूरत है. कोरोना महामारी के दौर में जिस तरह चुनावों में राजनेता भीड़ इकट्ठा कर रहे हैं, वो यकीनन देश में कोरोना विस्फोट करने में सक्षम है.

हालात कुछ ऐसे हो गए हैं, कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने भी कोरोना नियमों के उल्लंघन पर सवाल करना बंद कर दिया है. भारत के पास पर्याप्त समय था, कोरोना की वापसी रोकने और लोगों में उसकी जागरूकता बढ़ाने की. लेकिन वो सुनहरा समय प्रशासन और सरकारों ने आसानी से खो दिया. मेडिकल सुविधाओं की बेहतरी के लिए उपयुक्त काम नहीं हो सके. वैक्सीनेशन को भी बड़े पैमाने पर बढ़ाया जा सकता था. खैर, अब पछताए होत है क्या?

मुंबई वाले बाबा और पापा की बीच कुएं का पानी पीने की जिद्द!

छोटे दादाजी यानी बाबा को हम प्यार से मुंबई वाले बाबा बुलाते. मुंबई में नौकरी करने की वजह से ही उन्हें ये नाम दे दिया गया. एक चर्चा में मुझे जब मालूम चला कि उन्हें आखिरी सैलरी सिर्फ़ साढे बारह हजार रुपये ही मिली और कुल जमा छ: लाख पीएफ डिपाॅजिट. तो हैरान रह गया. मेरे हिसाब से वो 2001 या दो में रिटायर्ड हो गये थे और उन्होंने चालीस साल सेंचुरी कंपनी के मुंबई स्थित दफ्तर में काम किया था. यानी 1961 में जब उन्होंने नौकरी शुरू की होगी तो सैलरी बड़ी मामूली ही रही होगी. उन्होंने बंटवारे के बाद हम लोगों को भले छोड़ दिया या अपने परिवार से मोह कर बैठे लेकिन उनकी कर्तव्यनिष्ठा पर सवाल उठाने का हमें कोई हक नहीं है.

मुंबई में उन्होंने फ्लैट भी लिया, वो जिस भी कीमत का हो. वो उनके मेहनत और धैर्य के आगे कुछ भी नहीं. हमें उनका आदर करते रहना चाहिए. उन्होंने अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया. कम से कम चालीस साल तक तो वो साथ निभाते ही रहे और मैं जब भी घर पर रहा हूँ. लाख रंजिशें रही हों, पर कभी उनका कहना ना सुना हो! ऐसा नहीं हुआ. कोई लाख आरोप लगाये या बातें बनाये लेकिन हमने उन्हें कभी नहीं छोड़ा. एक बार गांव में ही किसी के घर से मुंबई वाले बाबा का विवाद बढ़ गया. झगड़े की नौबत आ गई. पिताजी घर पर थे, वो गए और मुंबई वाले बाबा को कहा- चाचा तू चला घरे, हम देखत हयी सबके. पापा ने पूरे मामले को संभाला और सबको शांत करवाया.

छोटी दादी इस बात के ताने भी मारतीं, कि अगर तुम्हारे पापा को मुंबई वाले बाबा कुएं से नहीं निकालते! तो तुम लोग आज मुझसे झगड़ा नहीं करते. उनके इस ताने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. पापा के बचपन का किस्सा है. साठ के दशक की बात होगी शायद. तब कुएं के पानी से ही सारा काम चलता. रहट से सिंचाई की जाती और ढेबरी लगाकर पीने का पानी रस्सियों से निकाला जाता. बड़की माई बतातीं कि पापा ने जिद्द पकड़ ली थी कि वो कुएं के बीच का जो सबसे साफ पानी है, वही निकालने पर पीएंगे. दादी को रसोईघर के और भी करने थे. इस नाते वो गुस्से में ये कहते हुए चली आई कि जाओ पीओ बीच कुएं का पानी. फिर क्या था? पिताजी भला बड़की माई का कहा, नहीं मानते.

सो उन्होंने बीच कुएं का पानी पीने की अपनी जिद्द पूरी करने के लिए छलांग लगा दी. इनकी उम्र दस बरस से कम ही रही होगी. तैरना तब शायद आता नहीं था. नतीजा ये निकला कि पापा कुएं में डूबने लगे. किसी ने इसकी जानकारी घर पर दी. लोग रस्सी डोरी का बंदोबस्त करते, उससे पहले मुंबई वाले बाबा उन्हें बचाने के लिए कुएँ में कूद पड़े. पापा को मुंबई वाले बाबा ने अपनी जान की परवाह किए बगैर बचाया और इसके लिए बड़की माई ये किस्सा सुनाते हुए उनके प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर करते कभी ना थकती.

आगामी पीढ़ियों को इस बारे में जानकारी बनी रहे. इस नाते मैंने ये छोटा सा वाकया इंटरनेट पर शेयर किया है. उम्मीद है कि वो भाव जो पापा, मुंबई वाले बाबा के प्रति रखते और जो अनुराग मुंबई वाले बाबा बंटवारे से पहले पापा के प्रति रखा करते थे. उसमें लेशमात्र की भी कटौती किसी को नहीं करनी चाहिए!

मैं फटी हुई या रिप्ड जींस हूं!

मैं फटी हुई जींस या रिप्ड जींस हूं! मैं जींस की फैंसी वर्जन हूं. मुझे तरक्कीपसंद सोच के लड़के या लड़कियां; यहाँ तक की महिलाएं और पुरुष बड़े शौक से पहनते हैं. उत्तराखंड के नये सीएम ने मुझे सुर्खियों में ला दिया है. उनकी संस्कृति के आड़े मैं आ रही थी. सो उन्होंने एक ऐसी महिला का हवाला दिया जो मुझे पहने हुई थी. तीरथ रावत मेरी बदौलत उस महिला को ताड़ते रहे! वैसे मुझे पुरुष भी पहनते हैं लेकिन अगर महिला पहनती है तो तीरथ सरीखे लोगों को उसका चरित्र निर्धारण करने और कुछ भी कहने का जन्मसिद्ध अधिकार मिल जाता है.

महिलाओं की जांघ और पुरुषों की जांघ तो एक जैसे ही होते हैं. फिर अगर मुझे महिला पहन ले तो उसकी मंशा और चलन पर संस्कृति के पहरेदार आकर वाहियात तर्क और बातें क्यों गढ़ने लगते हैं. मुझे बहुत अच्छा लगा जब लैंगिक समानता की पक्षधर महिलाएं तीरथ के बेहूदे कमेंट के बाद सोशल मीडिया में उस सोच और सड़ी मानसिकता का विरोध मुझसे सुसज्जित होकर करने लगी. मैं फूले नहीं समा रही थी जब तीरथ की फजीहत हो रही थी और लिंगभेद के खिलाफ मेरी बदौलत ही आज छोटा ही सही एक आंदोलन चल सका. भारत की संस्कृति का हवाला देकर मुझे बाहरी बताने वाले लोगों से मेरा सवाल है कि जब सिलाई कला अस्तित्व में नहीं आया था तब महिलाएं कहाँ-कहां और क्या क्या रफू करके पहनती रहीं होंगी. दरअसल; ऐसे संकीर्ण सोच की परेशानियां मुझसे नहीं है बल्कि उनके बीमारू जेहन से है.

ये जो मिथुन चक्रवर्ती हैं!

गरीबों के अमिताभ बच्चन कहे जाने वाले मिथुन चक्रवर्ती फिल्मों के स्टार हो सकते हैं लेकिन राजनीति में अवसरवादी और दलबदलू नेताओं में इनका नाम शुमार हैं. मिथुन चक्रवर्ती आज बीजेपी का दामन थाम चुके हैं लेकिन इनका राजनीतिक सफरनामा सीपीएम, कांग्रेस, टीएमसी होते हुए यहां तक पहुंचता है.

शारदा चिटफंड घोटाले में नाम आने के बाद राजनीति से संन्यास लेने वाले मिथुन दा फिर से राजनीति में आ गये. हालांकि, उन्होंने कांग्रेस के नेता प्रणब मुखर्जी के समर्थन में भी प्रचार किया लेकिन कभी कांग्रेस की सदस्यता नहीं ली. सीपीएम की सरकार के परिवहन मंत्री रहे सुभाष चक्रवर्ती के सबसे बड़े करीबियों में मिथुन चक्रवर्ती का भी नाम आता है.

सीपीएम के बाद मिथुन दा टीएमसी में आए, टीएमसी के कोटे से राज्यसभा पहुंचे लेकिन शारदा चिटफंड में नाम आने के बाद इस्तीफा दे दिया. ज्योति बसु सरकार में भी मिथुन चक्रवर्ती होप 86 नाम से बड़ा कैंपेन चला चुके हैं. मिथुन कई बार खुद को वामपंथी बता चुके हैं.

अब बीजेपी में शामिल होने के बाद उनका वामपंथ लोप हो गया हो तो वो अलग बात है. कुल मिलाकर मिथुन चक्रवर्ती का राजनीतिक सफर पंचमेल खिचड़ी की तरह रहा है. 70 साल के राजनेता और अभिनेता को आगे कितनी सफलता मिलती है, देखने की बात होगी?

महिला दिवस का सुरूर!

महिला दिवस आने वाला है. कुछ महिला लेखिकाओं में अचानक नारीवाद उफान मारेगा. दुनियाभर की महिला लेखिकाएं भी हफ्ते भर से सक्रिय दिखाई दे रही हैं. काश! ये मुहिम दिन रात चलाई जाती और इसी ऊर्जा के साथ! तो शायद नारी अस्मिता का आकाश पूरी तरह से साफ दिखाई देता.

फेमिनिज़म में विश्वास रखने वाले लोग औरत और मर्द दोनों हो सकते हैं. इसी तरह महिलाओं के अधिकारों को छीनने वाले भी सिर्फ़ पुरूष ही नहीं होते, महिलाएं भी होती हैं. बलात्कार यानी रेप के वो मामले जो जबरन होते हैं, उनपर बात करना जरूरी है! लेकिन आपको ये सुनकर हैरानी होगी कि शादी के बाद दुनिया के 70 फीसदी मर्द अपनी पत्नी के ही साथ जबरन सेक्स करते हैं यानी रेप करते हैं.

अमेरिका और यूरोप में इन मसलों पर बात होती है. भारत सरीके देशों में भी इसपर बहस की जानी चाहिए. शादी, अगर रेप का सर्टिफिकेट बनकर रह गया है और शादी के बाद महिला को समाज के डर से बलात्कार जैसे वीभत्स अपराध को सहना पड़ रहा है. तो नारीवाद को मुखर होने की जरूरत है.

कार्यस्थल पर महिलाएं अपनी सहकर्मी महिलाओं को चुपचाप प्रताड़ित या शोषित होती देखती हैं. उनके लिए आवाज़ नहीं उठाती. कई मामले तो ऐसे भी हैं. जिनमें महिलाएं पुरुषों के साथ मिलकर अपनी जूनियर का शोषण करती हैं. ये शर्मनाक है.

तो ये ख़याल मन से निकाल देना होगा, कि सारे मर्द और महिलाएं एक जैसी होती हैं. ये बात भी अजीब है कि महिला विमर्श की बातें सिर्फ औरतें ही करेंगी. सबसे मूलभूत समस्या यही है. कुछ सांस, जिनके बेटे सिर्फ उनकी सुनते हैं वो खुद की बहू का शोषण कर रही है. अलबत्ता, वो पति! जो अपनी बीवी की ही सुन और कर रहा है अपनी बुजुर्ग मां को जीभर के प्रताड़ना दे रहा है.

हम भारतीयों का मनोविज्ञान यही है कि हम बिना केस स्टडी मसलों पर अवधारणा बना लेते हैं. जोकि पूरी तरह से अनुचित है. ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जिसमें महिलाएं अपने विशेषाधिकारों का गलत इस्तेमाल करती पायी गई. किसी अच्छे भले इंसान को झूठे दहेज केस में फंसा दिया.

उन्हें ये बात पता है कि महिलाओं की खूब सुनी जाती है. ये अपवाद भी नारीवाद को लचर कर रहे हैं. महिलाओं को उनका हक बिना भेदभाव के चाहिए और यही एक आदर्श व्यवस्था के लिए जरूरी भी है. लेकिन महिलाओं को भी पुरुषों के अधिकारों को छीनने की कुत्सित चेष्टा को छोड़ना होगा.

एक ‘अज्ञानी’ प्रधानमंत्री के भरोसे मत बैठिये!

2014 के बाद भारतीय राजनीति आस्था का विषय बना दी गई है. अनहद भक्तियुग! कोई प्रधानमंत्री के झूठे दावे के खिलाफ नहीं बोलेगा? नहीं तो उसे गालियाँ दी जाने लगेंगी. उनके अतार्किक और अज्ञानी बातों पर सवाल उठा दे तो उनके समर्थक जान से मारने की धमकियाँ देंगे! एनडीए सरकार की विफलताओं पर बोलने पर लोग उसे सोशल मीडिया पर ट्रोल करेंगे और तमाम तरह से परेशान करना शुरू कर देंगे. देश गर्त में जा रहा है लेकिन कोई आवाज़ ना उठाये. ये लोकतंत्र है और बतौर भारतीय नागरिक हम अपनी सरकार से सवाल पूछने के लिए प्रतिबद्ध हैं और पूछेंगे भी!

युवाओं को देश की समस्याएं जाननी होंगी और उसके समाधान की तरफ़ कोई कदम उठाना होगा. हमें एक प्रधानमंत्री के भरोसे नहीं बैठना चाहिए और ऐसे प्रधानमंत्री के भरोसे जो ज्वलंत विषयों पर गंभीरता नहीं दिखाता बल्कि बहुसंख्यक आबादी को अपने खेमे में मिलाने के लिए तमाम संप्रदायों में बिखरी भारतीय अस्मिता को कपड़े से पहचानने की बात करते हैं. 35 साल तक भिक्षा मांगकर जीवन यापन करने की बात करेंगे. एक युवा भिक्षा मांगे; ये उचित नहीं है. उसकी आत्मा में अगर जरा सा भी जीवन शेष होगा वो काम करेगा.

सैंकड़ों वीडियो ऐसे मिल जाएंगे जिसमें पीएम मोदी खुद कहते हैं कि हाईस्कूल से ज्यादा पढ़ाई नहीं हो पाई लेकिन अमित शाह उनके सर्टिफिकेट पर पीसी करने जरूर आएंगे. विश्व स्वास्थ्य संगठन कह रहा कि किसी पारंपरिक दवा को वो सर्टिफाई नहीं करेगा. लेकिन कोरोनिल के प्रचार के लिए हमारे दो कैबिनेट मंत्री मुस्तैदी के साथ उसका विज्ञापन करेंगे.

नाली के गैस से चूल्हा जलाने वाले प्रधानमंत्री पर स्पूफ बने तो लोग आगबबूला क्यों होते हैं. वायुमंडल के गैस से पानी बनाने वाले पीएम पर विज्ञान युग उपहास क्यों नहीं कर सकता. बादल घिरने पर रडार काम नहीं करेंगे किसी भौतिकविद् से ये बात पच सकती है. बच्चों को परीक्षा पर टिप्स देनी है लेकिन खुद का जीके इतना कबाड़ बना दिए हैं उसपर कोई सवाल करे तो उसे देशविरोधी घोषित कर देंगे.

राष्ट्रवाद की अफीम का नशा होता ही ऐसा है कि सब कुछ लुटते हुए भी लोगों को हकीकत पर भरोसा नहीं होता. भारतीय अर्थव्यवस्था की जो वर्तमान स्थिति है; वो बेहद चिंताजनक है. बेरोजगारी की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ. वो दिन दूर नहीं जब भारत सरकार का रवैया ब्रिटिश हूकूमत की तरह ही दिखेगा. अखबार उठाकर पढ़िए, लगेगा रामराज्य आ ही गया है लेकिन जब आप उस व्यवस्था का जायजा खुद करने जाएंगे तो सब कुछ फरेब लगेगा. सभी दावे झूठे लगेंगे. सभी सरकारी नीतियों के विज्ञापन धोखेबाजी करते नज़र आएंगे.

दुनिया जिसे कहते हैं!

जो लोग दुनिया की जानकारियों की समझ विकसित कर लेते हैं; उन्हें एक समय बाद राष्ट्रीय समस्याओं में उतनी दिलचस्पी नहीं रह जाती. क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ होने के बाद देश के मुद्दे गौण लगने लगते हैं. या यूँ कहे कि राष्ट्रीय मुद्दों से आपका सरोकार और दिलचस्पी धीरे-धीरे घटने लगती है. आज एक बहुत ही दिलचस्प खबर आई ट्यूनीशिया से. जहाँ पर एक डाॅक्टर अस्पताल में मरीजों को हिम्मत और हौसला बनाये रखने के लिए वायलिन बजाकर सुनाते हैं. वायलिन की धुन सुनने के बाद कैंसर और कोरोना के दोहरी मार को झेल रहे मरीज खिलखिला उठते हैं. ऐसा लगता है मानो उन मरीजों को; जो जिंदगी से नाउम्मीद हो चुके हैं, दवा से भी जरूरी वायलिन की धुन की जरूरत है. दुनिया को ऐसा ही होना चाहिए. दूसरों के काम ना आ सकें तो फिर इंसान होने का फायदा ही क्या है?

चुनाव में हार के बाद अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति पहली बार किसी कार्यक्रम में शिरकत करने जा रहे हैं, लेकिन ये अमेरिका के लोकतंत्र की ही शक्ति है कि उनके भड़काऊ बयानों के लिए उनके अपने लोग भी उनसे खफा होकर बैठे हैं. ईरान भी कमाल का देश है! अमेरिका से परमाणु समझौते को लेकर असहमति को आज यूएन के न्यूक्लियर चीफ पर निकाल दिया. मानिटरिंग की मकसद से लगाए उनके सर्विलांस कैमरे को दो बार बंद किया गया. इससे साफ जाहिर है कि ईरान के राजनेताओं की अमेरिका से किस हद तक ठनी है. अमेरिका को बार बार धमकियाँ देने वाले टर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन के रुख में भी नरमी देखने को मिली, अब वे भी अमेरिका के साथ मिलकर आगे बढ़ने की मंशा दिखा रहे हैं.

अमेरिका में बंदूक को ट्रंप प्रशासन ने खिलौना बनाकर रख दिया था. जब से बाइडेन राष्ट्रपति बने हैं; बेतहाशा बंदूकें खरीदने पर सख्ती दिखा रहे हैं. जिसके चलते आज न्यू आर्लियंस के एक गन स्टोर में ही हमला हो गया. क्रॅस फायरिंग में हमलावर तो मारा गया लेकिन दो लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी. वहीं; 2017 से गृहयुद्ध झेल रहे अफ्रीकी देश नाइजर में आज राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान हुआ. अमीर देश सर्बिया के पास आज चार तरह की वैक्सीनें उपलब्ध हैं. स्पुतनिक, सायनोफार्म और फाइजर की तो पहले ही मंगवा चुके थे; आज वहाँ के राष्ट्रपति एलेक्जेंडर वुसिक खुद एयरपोर्ट पहुँच एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन का जायजा लेने पहुंचे थे.
आज आस्ट्रेलियन ओपन में नोवाक जोकोविच 9 वीं बार चैंपियन बनकर मेन्स सिंगल्स का खिताब अपने नाम किया.

मुझे लगता है कि भारत के युवाओं की संकीर्ण सोच को विकसित करने और बेकार के घरेलू मुद्दों में उलझनें से बेहतर है कि वे विश्व नागरिक बने और दुनिया को जानने की कोशिश करें. मेरा दावा है कि अध्ययन और अनुभव दोनों मजेदार होगा!

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