भारतीय सिनेमा को पंचम दा का  चार दशक का सहारा

दिग्गज संगीतकार, बॉलीवुड संगीत में एक अलग तरह का उमंग भरने वाले, अपने गाने के जरिए श्रोताओं के दिलों को धड़काने वाले, तकरीबन 300 से ज्यादा फिल्मों में संगीत का सहारा देकर उन फिल्मों का रूप-रंग बदलने वाले एक संगीतकार जो अपनी अलग पहचान को सदीयों तक बना रख पायेगा, नाम है आर. डी. बर्मन.

संगीत निर्देशक के रूप में पंचम ‘दा’ ने 1960 से लेकर 1990 यानी तीन दशक का समय जो उन्होंने पूरी शिद्दत से हिन्दी सिनेमा को दिया, जो उनका हमेशा कर्जदार बनकर रहेंगी.

आर. डी. बर्मन ने 331 फिल्मों में गानों को धुन दिए, एक अलग ट्रैक दिया और नई तरह की स्पीड दी.

20वीं सदीं के बड़े संगीतकारों ने बर्मनजी के साथकाम किया और सबने कुछ ना कुछ उनसे सीखा.

ऐसा भी कहा जा सकता है कि आर. डी. बर्मन अपनी पीढ़ी के ऐसे संगीतकार हैं जिन्होंने संगीत के सफरनामा में बड़ा योगदान दिया और अगली पीढ़ी को इस बात से आगाह किया कि आखिरकार कैसे किसी फिल्म में संगीत का दमखम रखा जा सकता है.

उनका जन्म कलकत्ता का सौभाग्य

ये कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि सचिन देव बर्मन के संगीत मिशन को आगे बढ़ाने के लिए ही उनका जन्म हुआ और शायद ये भारत के साथ ही साथ कलकत्ता का भी सौभाग्य ही था जो रवीन्द्रनाथ टैगोर, सत्येन्द्रनाथ और कई अपने बिषय के माहिर कलाकारों, प्रतिभाओं की जन्मस्थली कलकत्ता हुई. इनकी दादी इन्हें तुल्बू बुलाती थी.


पंचम बनने की वजह

आज वो हम सबके बीच पंचम दा के नाम से लोकप्रिय है, लेकिन इस नाम के पीछे दो तरह की वजह बताई जाती है. कुछ लोगों का कहना है कि बचपन में ये जब रोते थे तो उनके मुंह से पा निकलता था जोकि संगीत का पांचवां स्वर है इस नातो इन्हें पंचम कहा जाने लगा.

लेकिन कुछ लोगों का ऐसा भी कहन है कि जब ये फिल्म अभिनेता अशोक कुमार को सा, रे गा, मा, पा गाकर सुनाया था तब उन्होंनें इन्हें पहली बार पंचम कहकर बुलाया था.

 संगीत का दिशानिर्देश

फिलहाल इनके पिता बॉलीवुड के संगीतों से जुड़े थे इस नाते संगीत का शुरूवाती दिशानिर्देश इन्हें घर पर मिला था. घर पर संगीत का बना माहौल इन्हें उसमें ढ़लने में कामगर साबित हुआ और संगीत को अपने भीतर रमाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ा.

 

इनका पहला गाना :  ऐ मेरी टोपी पलट के आ

9 साल की उम्र में ही आर. डी. बर्मन ने अपने पिता के दिशा निर्देशन(संगीत) में बन रही फिल्म फंटूस में गाना दिया था. जो कुछ इस प्रकार था.

https://www.youtube.com/watch?v=oVE8zvQPINM

उन्होंने अपने बचपन में एक और गाना कंपोज किया था, सर जो चकरायें . इस गाने को इनके पिता ने गुरूदत्त की फिल्म प्यासा में बाद में जाकर इस्तेमाल किया था.

https://www.youtube.com/watch?v=rJiohcg-gKo

सरोद और तबला की ट्रेनिंग

उस्ताद अली अकबर खान इनके सरोद ट्रेनर थे. तबला की सीख इन्होंने समता प्रसाद से लिया. ये सलिल चौधरी को भी अपना संगीत ट्रेनर मानते है क्योंकि हारमोनियम सीखने में इन्होंने उनकी मदद ली थी.

चलती का नाम गाड़ी(1958), कागज के फूल(1959), तेरे घर के सामने(1963), बंदिनी(1963), ज़िद्दी(1964), और गाइड(1965) में इन्होंने सहायक म्यूजिक कंपोजर के रूप में काम किया.

माउथ आर्गन का इस्तेमाल जिस गानें में इन्होंने किया था, उसका नाम था हैं अपना दिल तो अवारा. 1958 की फिल्म सोलवां साल में चलाई गई.

https://www.youtube.com/watch?v=Arw272Sv4YI

 1959 में पहली बार बनें म्यूजिक डाइरेक्टर

फिल्म थी राज. फिल्म निर्देशक गुरूदत्त थे. बहरहाल ये फिल्म सफल नहीं हो पाई, लेकिन इस फिल्म में बर्मन साहब ने दो गानें लिखें थे. पहला गाना गीता दत्त और आशा भोंसले ने गाया था. दूसरे गाने को शमशाद बेगम ने गाया था.

एक आत्मनिर्भर संगीत निर्देशक के रूप में आर. डी. बर्मन ने 1961 की फिल्म छोटे नवाब में सफलता की नई कड़ी स्थापित किया था.

बर्मन की पहली हिट फिल्म

तीसरी मंजिल में उन्हें अच्छी सफलता मिली. इसमें 6 गाने थे. जिसको मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा था और रफी साहब ने इनकों अपनी आवाज दी थी.

आज पंचम दा हमारे बीच नहीं है. लेकिन उनका प्रयास सबके सामने हैं.

Published by Abhijit Pathak

I am Abhijit Pathak, My hometown is Azamgarh(U.P.). In 2010 ,I join a N.G.O (ASTITVA).

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