​हिन्दी की साख पर प्रश्नचिह्न मत उठाइए!

ग्लोबल भाषा, दुनिया की चौथी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा और 50 देशों में पढ़ाई जाने वाली भाषा के स्वर्णिम भविष्य पर सवालिया निशान उठाना बिल्कुल गलत है. जिस भाषा के अग्रदूत कभी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र रहे हो, जिस भाषा का फलसफा अपने आप में विश्व के हित में, मानव कल्याण और सतत विकास के राह बना चुका हो. जिस भाषा के सपूतों ने उसकी संवृद्धि के लिए दिन रात एक कर दिए, जिस भाषा को अपना कवचहस्त बनाकर प्रेमचंद्र जैसे साहित्यिक पत्रकारों ने आजादी का बिगुल फूंका, और हिन्दी में कलमबाजी कर एक ऐसा रास्ता निकाला जिसके द्वारा आमजन को ये लगने लगा कि अब बहुत हुआ, अब विद्रोह और हक के लिए अपनी आवाज बुलंद करने की जरुरत होनी चाहिए, जिस हिन्दी ने पत्रकार गांधी को ये आभास करा दिया था कि अगर वो हिन्दी के साथ कदमताल मिलाकर चलते है तो ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुंच सकते है.
इस भाषा पर तो हमें फक्र, नाज और गुमान होना चाहिए.

आपको बता दें कि हिन्दी एक विश्वस्तर पर सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है. दुनियाभर में 50 करोड़ लोग बातचीत के लिए हिंदी में अपने आपको बेहतर महसूस करते हैं. 50 से ज्यादा देशों में लोग हिन्दी की तरफ अपना कदम बढ़ाते नजर आ रहे हैं, सीख रहे हैं, पढ़ रहे हैं.

आज डिजिटल युग में 15 से ज्यादा सर्च इंजन हैं, जिससे हिन्दी के भविष्य और साख पर सवाल उठाना अनुचित सा लगता है. 

लेकिन इसी के साथ चुनौतियां भी है, जो सुधार हम सही तरीके से #HindiDiwas मना सकते हैं. 

पहला, अभी  तक इंटरनेट पर हिंदी टाप टेन में शामिल नहीं है, इसके लिए हिन्दी पर एक प्रयोग करने की जरुरत है, जिसमें ऐसा किया जाये कि हिन्दी में ज्यादा से ज्यादा कंटेंट जनरेट किया जाये. लोग हिन्दी फांट में लिखे और की वर्ल्ड का प्रयोग हिन्दी में करने का प्रयोग कर एक नये युग का सूत्रपात कर इस चुनौती से हिन्दी को डिजिटल युग में दुनिया को हिन्दी की तरफ मोड़ सकते हैं.

ताउम्र हम उम्मीद में….., 

Published by Abhijit Pathak

I am Abhijit Pathak, My hometown is Azamgarh(U.P.). In 2010 ,I join a N.G.O (ASTITVA).

One thought on “​हिन्दी की साख पर प्रश्नचिह्न मत उठाइए!

  1. हिंदी के आशिक आप हैं तो हम भी हैं….
    आप और हम सभी उड़ने का स्वप्न देख रहे हैं दोस्त…
    अपनी अपनी कलम से…
    कलम के बिषय में मेरी सोच यह है कि
    साधारण मनुष्सय और पशु जन्म, पोषण, प्रजनन और मृत्यु के सामान्य चक्र में आने जाने के बीच
    केवल स्वहित संवेदी होते हैं, विचारवान अपने साथ-साथ अपने सरोकारों के प्रति भी संंवेदनशील होता है…
    और वही सपनों को जन्म देकर, कलम को कागज पर शब्द उगलने विवश भी करता है…
    सपने जरूरी हैं …
    बड़े सपने…
    सपने होंगे तब ही तो सच होंगे !!!
    ज्ञानीजन ऐसा कहते रहे हैं .
    .
    आपका ब्लाग ही आपके सपनों को सच करने में
    बहुत बड़ा सहयोगी हो सकता है….
    आप चाहें तो…
    हमारी अनौखी परस्पर सहयोग योजना में
    साथ जुड़िये
    साथ दीजिये
    साथ लीजिये
    सबका सहयोग कर
    सबसे सहयोग ले
    सब आगे बढ़िये…..
    साथ आइये …
    साथ लाइये …
    फालो कीजिये-
    https://lekhanhindustani.com
    …. साथ पाइये, हमारा लेखन हिन्दुस्तानी के वर्तमान और भावी सदस्यों का!!!!!!
    (व्यक्तिगत संदेश पर विस्तृत जानकारी पाइये, हमें फालो कीजिये… अभी …)
    – सत्यार्चन

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