आर्थिक सुधार पर सवाल 

इस देश में आर्थिक सुधार के लिए सबसे पहला कदम देश के सभी लोगो को बैंकिग व्यवस्था से जोड़ा जाना था. सरकार ने खाता खोले जाने की कवायद  किया. जन-धन योजना के माध्यम से लोगो को बैंक से जोड़ने के लिए सरकार ने विज्ञापन पर बेहिसाब पैसा खर्च किया. आर्थिक सुधार के लिए जब जन-धन योजना के नाम वाली पहली रणनीति बनाई गई तो एक बड़ा तबका बैंकिंग व्यवहार से नहीं जुड़ पाया, आज भी देश के 60 करोड़ लोग बिना बैंक खाते के है. दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि आर्थिक सुधार के पहले चरण में ही सतत योजना  के काम काज को जैसे लकवा मार गया हो. 
आर्थिक सुधार का दूसरा कदम आय घोषणा योजना के रूप में सबके सामने आया. जिसमें सरकार ने वैध स्रोतों से कमाये गये कालेधन पर कर लगाया और उसे वैध में बदलने की कोशिश की गई थी.
इसको भी सफलता नहीं मिल सकी और पहले से ही जन-धन योजना के रूप में लकवे का शिकार आर्थिक सुधार इस बार के ठोकर से जमीन पर गिर पड़ा. क्योंकि तमाम रियायतों के बाद भी सारा पैसा वैध नहीं हो सका था.

आर्थिक सुधार का तीसरा कदम नोटबंदी था, जिसमें जनता को बरगलाया गया और अचानक से स्विस बैंक का सारा कालाधन देश के बैंकों में आ गया. ग्लोबल मंचों पर अर्थव्यवस्था के लिए प्रसिद्ध देश के दो अर्थशास्त्री चिल्लाते रहे. अमर्त्य सेन ने कहा कि नोटबंदी कारगर उपाय साबित नहीं होगा. मनमोहन सिंह ने कहा कि नोटबंदी से  GDP में 1-2 फीसदी की कमी होगी. सुनने वाला कोई नहीं था. 
जब प्रणव मुखर्जी वित्तमंत्री थे तो एक छापा डाला गया था. देशभर में करेंसी में कितना कालाधन है इस बात को समझने के लिए. उससे यह पता चला था कि पूरे करेंसी में केवल 7 फीसदी कालाधन है. 
आर्थिक सुधार का आखिरी और चौथा कदम बैंकों में जमा सारा पैसा किन-किन वैध स्रोतों से अर्जित किया गया है्  इसका खुलासा करना या यूं कहे कि पता लगाना था.

ये कदम उठाया जाना अभी बाकी है. 

लेकिन इन आर्थिक सुधारों में कैशलेस व्यवस्था को ज्यादातर लोग सही नहीं ठहराते है. संजय सहाय ने अपने लेख अर्थव्यवस्था के आखेट भाग- दो में लिखा है कि;

“राष्ट्रभक्ति का गीत बजाते और कैशलेस समाज के गुण गाते प्रधान(प्रधानमंत्री) पेटीएम को प्रमोट करते दिखे जिसकी 40 फीसदी हिस्सेदारी अलीबाबा नाम की एक चीनी कंपनी की है और यह कंपनी अब पेटीएम की सत्तर फीसदी भागीदारी खरीदने पर विचार कर रही है. यह वही पेटीएम है जिसके निवेशकों पर धोखाधड़ी के केस में मध्यप्रदेश की पुलिस संज्ञान ले चुकी है.”

गौरतलब बात यह है कि मौजूदा हालात में चीन के साथ हमारे रिश्ते अच्छे नहीं है. चीन ने पाकिस्तान को आर्थिक काॅरिडोर में भी आर्थिक सहायता दिया है.
पेटीएम विक्रेताओं से 20 फीसदी तक का मुनाफा कमाती है. 

नोटबंदी के दौरान कैश की किल्लत थी आज भी  देखी जा रही है. 

ये आर्थिक सुधार का प्रपंच ही था जिसके चारों चरण में कोई ना कोई खामी मौजूद थी. इस दौरान लोगो को इंडिया टुडे के संपादक अंशुमान तिवारी का लेख ‘मैले हाथों से सफाई’ जरुर पढ़ना चाहिए था. बहुत ही पठनीय लेख था. पी. चिदंबरम का लेख ‘आरबीआई की स्वायत्तता पर सवाल भी बहुत उपयोगी रहा. जिसका जवाब अभी तक नहीं मिल सका. 

इस फेहरिस्त में दो लाइनें;
चलो हम चलते है कुछ तरह सबको साथ लेकर,

गिरते-गिरते; सोते-सोते. 

– अभिजीत पाठक (विश्लेषक)

Published by Abhijit Pathak

I am Abhijit Pathak, My hometown is Azamgarh(U.P.). In 2010 ,I join a N.G.O (ASTITVA).

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