​आसान नहीं है प्रकृति से प्रेम करना

प्रकृति के कितने प्रेमी है जो उससे सच्ची सादगी करते है! इस देश में तमाम पर्यावरणविद है जो प्राकृतिक संपदाओं की हिफाजत के लिए जमीनी स्तर पर काम करते है. देश में ऐसे हजारों गैर सरकारी संगठन(NGO) हैं, जो पर्यावरण संरक्षण के लिए जाने जाते है. उनके प्रोत्साहन के लिए सम्मान और पुरस्कार की व्यवस्था सरकारें करती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आपको देश के पर्यावरणविदों को मिला सम्मान याद ही होगा. पर्यावरणविद चंडीप्रसाद भट्ट को अंतरराष्ट्रीय गाँधी शांति पुरस्कार इस दशक में ही मिला. ऐसे और भी देशज पर्यावरणविद है जो अपने आंदोलन में सक्रिय है. ये सक्रियता कितनी कारगर है, ये अलग बात है. 
अनुपम मिश्र भी झीलों और जलाशयों को संरक्षित करने वाले योद्धा थे, जिनका निधन अभी  हाल में ही हो गया. अनुपम मिश्र हिन्दी के मशहूर कवि भवानीप्रसाद मिश्र के बेटे है. 

प्रकृति का अपार प्रेम हमारे लिए किसी वरदान से बिल्कुल भी कम नहीं. हमें भी उनसे प्रेम करते रहना चाहिए. वे हमें ताजा हवा मुहैया कराती है. स्वास्थ्यलाभ के लिए फल देती है. झीलें बारिश के पानी को संग्रहित करती है और आने वाली पीढ़ी के लिए साफ पानी अपने गर्भ में रखती है. धरती के गर्भ में ही हमारा कल सुरक्षित हो पाता है. पानी जीवन के लिए बहुत जरूरी होता है. बिन पानी सब सून लिखने वाले रहीम ने हमें बहुत पहले चेतावनी दे दिया था. 

प्राकृतिक संपदाओं या संसाधनों में मिट्टी का भी महत्व खास है. मिट्टी हमें अनाज प्रदान करती है. मिट्टी किसी चमत्कार से कम नहीं है. मिट्टी में हम पौधारोपण करते है. मिट्टी में खेती होती है. मिट्टी बारिश के पानी को पेयजल बनाती है. 

बंजर जमीनों की सुधार के लिए देश की सरकारों को बहुत काम करने की जरुरत है. इससे किसानों की बेहतरी सुनिश्चित की जा सकती है.

 पौधारोपण और झीलों के पुनर्निर्माण की जरुरत भी बहुत ही बुनियादी काम है. हमें पेड़ की छाया में रहने की आदत डालनी चाहिए क्योंकि जिस वातानुकूलित(AC) में आजकल रहने के आदी हो गये है वो नुकसानदेह है. ये कई तरीकों से हमारे लिए घातक है. सूर्य से हमें विटामिन डी मिलती है. मगर सूर्य पराबैंगनी किरणों(ultraviolet) को भी निकालता है जो जीवन के लिए घातक है. इस पराबैंगनी किरणों से हमारा बचाव ओज़ोन नाम की एक परत करती है. मसलन, हम अपने संरक्षक ओज़ोन को समाप्त कर रहे है क्योंकि जिस AC में हम रहते है उसमें से क्लोरोफ्लोरोकार्बन निकलता है जो ओजोन के क्षरण का कारण है.

प्रकृति हमें उसके बाद भी संरक्षण देना नहीं छोड़ती. शंकराचार्य ने देवी दुर्गा के लिए एक स्तुति लिखा था; जिसकी चंद लाइने ध्यान में आ रही है,

“कुपुत्रो जायेत् क्वचिदपि कुमाता न भवति”

यानी बेटा भले नालायक हो जाये मगर माँ उसके हित संवर्धन में दिन-रात लगी रहती है. प्रकृति का नालायक बेटा पेड़ काटकर इससे इसका श्रृंगार छीन लेता है. इसके स्तन का पानी पीकर जीता है और झीलों को पाट देता है. इसके आंचल के स्वच्छ हवा में टहलता है लेकिन वृक्षारोपण नहीं करना चाहता. ये प्रकृति का कैसा बेटा है जो इसकी मुश्किले बढ़ाने के लिए काम कर रहा है. ग्लोबल वार्मिंग से प्रकृति का बेटा इंसान उसी की चिंताएं नहीं बढ़ा रहा. आगे चलकर इसे ही मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. समुद्री जलस्तर रोज बढ़ रहा है. इसमें भी धरती के बेटों की ही गलती है. 

अरे मेरे धरती के भाईयों! क्या कभी इस माँ ने तुम्हें आक्सीजन देने के लिए अपना पहचान देने की मांग की. इसने पूछा कि वो केवल इसी धर्म के लोगो को रहने के लिए प्रवास की व्यवस्था करेगी. इसने कभी कहा कि मेरे इस दुलार के बदले मुझे सम्मान दो, मेरी पूजा करो, मेरे लिए मंदिर और मस्जिद बनवाओं. 
इसने कभी कहा कि मेरा पानी पीने के लिए गीता और कुरान जैसी किताबें मेरे ऊपर क्यों नहीं लिखी गई? इसने बिना किसी असमानता के हमें प्यार दिया. 

उसने हिंदू को भी पाला. उसने मुसलमान को पाला, उसने सिख और ईसाईयों को भी अपनी ममता की छांव में रखा. उसने दलितों को दलित नहीं समझा. उसने जातिवाद को श्रय नहीं दिया. उसने विद्वता की बातों को निराधार करते हुए, सबके जीवन को बचाने की कोशिश को अंजाम दिया. 

उसने मौलवियों, महंतों और पादरियों को कभी कोई विशेष अनुराग नहीं दिया.

लैंगिक असमानता(Gender Inequality) का उसने पुरजोर विरोध किया. उसने बेटों और बेटियों में कोई फर्क नहीं रखा. 

उसने अपनी संतानों को अलग-अलग महाद्वीपों में रखा. लेकिन वो हरेक पर जान छिड़कती थी. प्रकृति ऐसी माँ है जो अपने सभी बेटों का पेट पालने के लिए अनाज की व्यवस्था करती है, फल, मेवे और सब्जियां मुहैया कराती है. 

हमें धरती को बचाने के लिए सारी असमानताओं को लांघकर, सारे भेदभाव भूलकर सड़क पर उतरने की जरुरत है. हमें अपनी माँ की सादगी भूलनी नहीं चाहिए.

अभिजीत पाठक

Published by Abhijit Pathak

I am Abhijit Pathak, My hometown is Azamgarh(U.P.). In 2010 ,I join a N.G.O (ASTITVA).

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