अखिलेश यादव से काम बोलता रहा और उन्होनें कुछ नहीं किया

पूरे हुए वादे, अब है नये इरादे। काम बोलता है। यूपी को ये साथ पसंद है। धरतीपुत्र मुलायम सिंह को पूरा भारत देश पसंद है। वग़ैरह-वग़ैरह.

यूपी में काम नहीं हुआ है. ये बात माननी पडे़गी. इसलिए क्योंकि ताल्लुकदारों की राजनीति अपने घरेलू विवाद और कलह को खुद जाहिर कर रहा था. लखनऊ, नोएडा, कानपुर, वाराणसी और इलाहाबाद के अलावा कन्नौज, मैनपुरी और आजमगढ़ के अलावा भी इस प्रदेश में जिले है. जो आज भी अर्थव्यवस्था से जोड़े नहीं गए है. जब तक छोटे शहर अर्थव्यवस्था से नहीं जुड़ जाते, काम चिल्लाकर कहता रहेगा कि इसे पूरा कर दों. मगर क्षेत्रवादिता का ये अंधापन काम को बोलते रहने देगा.
चीनी मील और हवाई पट्टी बना देने भर से पर्याप्त रोजगार सृजन नहीं हो जाता है. रोजगार सृजन के लिए अच्छी शिक्षा की जरुरत होती है. कई जिले ऐसे है जिनकी आबादी 50 लाख से ऊपर है, मगर वहां एक भी यूनिवर्सिटी नहीं खोली जा सकी. ये कैसा काम बोल रहा है आपका. पर्यटन स्थल वाले जिले तो अपने भरोसे अपनी गाड़ी खींच रहे है. चाहे आगरा हो, अयोध्या या मथुरा इनके लिए कोई उदारता क्यों नहीं दिखाई जा सकी.
हेलिकाप्टर से प्रचार करने के लिए पैसे पर्याप्त है इस राज्य के पास, मगर गांवों के खडंजे दुरुस्त करवाने के लिए पैसे नहीं है. लैपटॉप देने की हैसियत है इस सरकार के पास मगर युवाओं को महानगरों की तरफ रूख करना पड़ रहा है.
प्रदेश की स्थिति भयावह हो चुकी है. इन कामों को चुप कराने के लिए मौजूदा सरकार को उपयुक्त समय मिला था, मगर इसने तो ये समय गवां दिया. अब पछतायें होत है क्या जब चुग गई चिड़िया …,,,,,
सपा सरकार ये कैसे सोच लेती है कि लखनऊ में मेट्रो का हवाला देकर वो अन्य जिलों को अपना बना पायेगी. किस मुँह से वोट मागते है कुछ समझ नहीं आता.
अब इस बात का जवाब है क्या कि नोएडा और लखनऊ इतनी गति से आगे बढ़ रहे है और अन्य जिलों के विकास-गति में ब्रेक लगा दिया गया है.
यूपी के एथलीट्स भी आपसे त्रस्त है. ना उनके पास नजदीकी जिले में अच्छे ट्रेनर मुहैया करवाए गये है और ना ही साइंस्टिफिक ट्रेनिंग का कोई कायदा समझाया जाता है. ऐसे में हिम्मतवर प्रतिभाओं का स्वर्णिम भविष्य चौपट किया जा रहा है.
वैकेंसी आती है. फाॅर्म सबमिशन होता है. आवेदन शुल्क के नाम पर अच्छे पैसे कमाने के बाद, वैकेंसी रद्द कर दी जाती है. ये काम भी बोलता है और अंत में जाकर चुप हो जाता है. उन लाचारों की गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा सपनों का फार्म सबमिट करने में लग जाता है. इन पैसों की वापसी भी कभी नहीं हो पाती है. ये आपकी सरकार का टैक्सेशन का नया तरीका ईजाद किया हुआ जान पड़ता है.
बेरोजगारी भत्ता कहीं इन्हीं पैसों से तो नहीं दे रहे है आप. खैर, जो सरकार बैठा के पैसे दे रही है, उसकी उपलब्धि तो सबके सामने आनी ही चाहिए.
फैजाबाद के जिस रास्ते पर करोड़ों पेड़ लगाये गए थे वो शायद आपके कार्यकाल में नहीं लगा रहा होगा. एक साथ रास्ते बनवाने की आड़ में आपने इन पेड़ो को व्यापारियों के हाथों बहुत ही सस्ते दामों में बेच दिया, यहीं काम ए. राजा किए थे वो आज जेल में है. ए. राजा ने भारत सरकार के 2G स्पेक्ट्रम को प्राइवेट कंपनियों को सस्ते दामों में बेचा था. आपकी मनमर्जिया भला कोई कैसे रोक सकता है! ये काम भी कुछ बोल रहा है, सुन लीजिएगा.
विकास कार्यक्रम अलक्षित है. कुछ जिलों में सिंचाई के पानी की अनुपलब्धता की समस्या बरकरार है. कुछ जगहों पर भूखमरी भी है.
बड़े-बड़े नवाब लखनऊ आये और काम ना करने की वजह से ऐसे गए कि फिर वापस नहीं आ सके.
अंतिम वाक्य,
अगर काम बोलता तो, आवाम चिल्लाता क्यों ???
अभिजीत पाठक(विश्लेषक)

Published by Abhijit Pathak

I am Abhijit Pathak, My hometown is Azamgarh(U.P.). In 2010 ,I join a N.G.O (ASTITVA).

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