मेट्रो: एक मुकम्मल जहान

मेट्रो में भी एक मुकम्मल समाज रहता है. यहां भी सामाजिक बदलाव के प्रयास के तौर पर रिकार्डेड आडियो इंस्ट्रक्शन लगातार दी जा रही होती है, लेकिन सभी अपना-अपना स्वाभाविक धर्म पालने में कोई कसर नहीं छोड़ते. अगर यहां कोई संजीदगी से वसूली करने वाला पुलिसकर्मी होता तो पर्ची काटकर और नियमों का पालन ना करने का जुर्माना वसूलकर खूब कमाई कर लेता. दरवाजों पर लोग सोने से गुरेज नहीं करते. उसको बिछौना बना लेते हैं. खैर करे भी क्या, उनकी भी कुछ खास गलती दिखाई नहीं देती. कबसे सीट खाली होने का इंतज़ार करते-करते जब सीट खाली हुई तो बाजी किसी और ने मार ली. अब भीड़ भी तो बहुत है मेट्रो में. फोटोग्राफी की मनाही का तो निर्देश दिया गया है लेकिन सेल्फी के लिए किसी ने इनको मना नहीं किया. सेल्फी ऐसे ले रहे हैं जैसे बैकग्राउंड में ताजमहल हो. संवाद में कार्यकुशल प्रेमी जोड़े पूरी बातें, तकरार, प्यार और नोंकझोंक पूरी करके ही मानेंगे. इस समाज में हीरोपंती और गुंडई का भी किरदार निभाया जाता है. कुछ जो सीनियर सिटीज़न और महिलाओं को देखते ही उनको अपनी सीट आॅफर कर देते हैं, वो सीट से खड़े होने के बाद खुद को हीरो सरीके समझते और समझे जाते हैं. जो देखकर भी बैठे रहे, पहले तो उसको सीट लेने वाला झाड़ देता है, अगर ऐसा नहीं हुआ तो मेट्रो समाज उसे गुंडा करार देता है. मेट्रो में जब जगह ना मिलने पर कोई प्रवेश करने की कोशिश कर रहा होता है और मेट्रो का डोर फिर से खुलता और बंद होता है तो मेट्रो समाज में पहले आ चुके लोग उसे अचरज भरे नज़र से देखते है, बावजूद इसके अंदर आ जाने वाला आदमी नियमों का उल्लंघन करने के बावजूद अपनी सफलता पर मन ही मन खुश होता है.

Published by Abhijit Pathak

I am Abhijit Pathak, My hometown is Azamgarh(U.P.). In 2010 ,I join a N.G.O (ASTITVA).

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