ट्विटरखोरों की भाषा वाकई में शर्मनाक है!

अंग्रेजों ने प्रेमचंद का सोजे वतन जला दिया था लेकिन अपनों ने भरपूर साथ दिया था, अगर प्रेमचंद को भी ऐसी चुनौतियां मिलती तो शायद वो हिंदी के इतने बड़े नामचीन लेखक ना बन पाते!

कल न्यूज़रूम में एंकर चित्रा त्रिपाठी इस बात पर चिंता जाहिर कर रही थीं कि लोग छोटी सी गलतियों को राई का पहाड़ बना देते हैं और दिनभर की मेहनत के बारे में नहीं सोचते. वाकई, में ये बात काफी चिंताजनक बात है. मैंने पाया है कि वीकेंड पर चित्रा जी लगातार बुलेटिन करती हैं. लेकिन उनकी ऊर्जा में लेशमात्र भी कमी नहीं देखा जा सकता.

कल ये सुनने के बाद मैं ट्विटर पर उन बेहूदी टिप्पणियों को देखने गया. ऐसे लोगों की पहचान कर कार्रवाई होनी चाहिए जो संवाद में भाषाई मर्यादा को ताक पर रख रहे हैं.

मीडिया आलोचकों से लेकर उसके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाले लोगों ने कभी ये सोचा है कि मीडियाकर्मी आज के इस आफत में भी जी जान से सिर्फ़ इसलिए लगे हैं क्योंकि उन्हें तुम्हारी फ़िक्र तुमसे ज्यादा है. दरअसल, मीडिया वाले भी हर पल तुम्हारी भलाई ही करने की सोचते हैं. ठीक वैसे ही जैसे कोविड-19 की लड़ाई जीतने की कोशिशों में लगे वाॅरियर्स हमले के शिकार हो जाते हैं. आपके पास भरपूर वक़्त आप जब चाहे उसमें कमियां निकाले, गालियां दें और किसी पार्टी के इशारे पर काम करने का आरोप लगा दें! लेकिन हमारे पास इतना वक्त नहीं होता.

जान जोखिम में डालकर वे सभी एंकर्स, प्रोड्यूसर और कैमरामैन समेत टेक्निकल गतिविधियों में लगे टीवी जर्नलिस्ट भी दफ्तर जा रहे हैं. उन्हें तुम्हारी गालियों से कोई फर्क नहीं पड़ता. शायद कुछ लोगों का मोराल इस बात पर डाउन जरूर होता होगा कि महानगरों में रहते हुए सिर्फ़ और सिर्फ रहने खाने की बंदोबस्त वाली नौकरी ईमानदारी से करने के बाद भी कोई तारीफ़ नहीं करता है. कोई हमारे बेहतरीन काम पर ट्विटर पर पोस्ट नहीं डालता. भाई साहब, यहां तक की कुछ लोगों की कब नौकरियां चली जाती हैं पता भी नहीं चलता लेकिन जलती लपटों के बीच किसी न किसी पार्टी का प्रवक्ता जब जी में आए मीडिया को गरियाता देखा जा सकता है.

कोई मीडिया के लिये आचरणसंहिता बनाने का उपदेश दे रहा है तो कोई संविधान बदल कर अभिव्यक्ति की आज़ादी हटाने का मशवरा. कोई मीडिया को वेश्या कहता है तो कोई पालतू कुत्ता. कोई इनकी नई चुनौतियों की बात नहीं करता! जिस समय नई मीडिया तकनीकी बिखराने की बजाय खबरों को लैपटॉप या मोबाइल पर समेकित कर परोसना संभव बना रही हो, खबरें जमा करने, उनके संपादन, उनको परोसनेवाले अंतर्संवादीय प्लेटफॉर्म, मीडिया उपभोक्ताओं का उनके साथ सघन द्विपक्षीय बातचीत का रिश्ता और युवा मंडली की चलते फिरते 24×7 बारह किसम की खबरें टूंगते रहने की इच्छा एकदम नयी चुनौतियाँ फेंक रहे हों, बाज़ार में उतरा मीडिया इनको अनदेखा करेगा तो पिट जायेगा.
उस दौर में तुम्हारी औकात इतनी भर है कि तुम उसे गालियां दे लो!

चीन से लेकर मिस्र और अमेरिका से लेकर यूरोप तक के उदाहरण यह भी जता रहे हैं कि नये मीडिया को लताडना, उस पर रोक लगाना या उसका बहिष्कार करने का हर प्रयास अब नाकाम रहेगा. लिहाज़ा एक ही खबर को कई स्रोतों से जान कर ही वे अपनी अंतिम राय बनाते हैं. उनकी दिन रात की मेहनत का तुम्हें कोई अंदाजा नहीं है. वे रात में सोते समय भी कल की तैयारियों की चिंताएं करते हैं. तुम बस उन्हें गालियां दे सकते हो, तुम्हारी औकात भी इतनी ही है.

Published by Abhijit Pathak

I am Abhijit Pathak, My hometown is Azamgarh(U.P.). In 2010 ,I join a N.G.O (ASTITVA).

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