वो दोस्त, जो हमारे हर पल मुस्कराने की वजह बना !

((ये संस्मरण लिखने के पीछे सबसे महत्वपूर्ण हाथ नितिन सिंह का ही है. या यूं कह दिया जाये कि किसी की कही कोई बात दिमाग में घर कर जाए और निकलने को राजी ही ना हो तो उसे प्रेरणा का नाम दिया जाता है.))

((इस मामले में मैं उसका आभारी हूं कि अनजाने में ही सही उसने मुझे कोई राह तो दिखाया. नहीं तो शायद मेरे भीतर का साहित्यिक ज्वालक बुझ ही गया होता. लोग मानने को तैयार नहीं होंगे लेकिन हमेशा बिना मतलब की वाहयात बातें करने वाले नितिन की कही एक बार मेरे लिए उपयोगी साबित हुई. और मैं इसके लिए उसे तहेदिल से शुक्रिया करना चाहता हूँ. ))

नितिन सिंह, मुंहफट जरूर है लेकिन दिल का इतना सुंदर की अगर आप कहीं फंस गए और उसे पाताल में बुला दीजिए तो भी वो पहुंचेगा ज़रूर. मेरी उसके साथ लखनऊ कि एक सहयात्रा बहुत दिलचस्प रही. 600 किमी की दिल्ली से लखनऊ के बीच की दूरी पता ही नहीं चला कि कब खत्म हो गई. रास्ते भर बहुत सारी बातें हुई. लेकिन कुछेक बातें अभी भी जेहन में कैद है.

नितिन ने मुझसे कहा था कि अभिजीत याद रखना कि किताबों से बाहर भी एक बड़ी दुनिया है. जो बेहद दिलचस्प अनुभव देने वाली है. मेरा उत्तर था कि यार नितिन, किताबों में सिर्फ़ काल्पनिक घटनाएं या कहानियां नहीं होती. उसमें तो हमारे परिवेश और समाज की ही बातें लिखित माध्यम में दर्ज रहती है. बिना रुके उसने कहा कि कब तक दूसरों की कहानियां पढ़ोगे. मैं जवाब नहीं दे पाया. उसका परामर्श आया ‘अपनी कहानी ढूंढों’.

चलती ट्रेन में भी बातचीत का अलग ही माहौल होता है. ट्रेन के पहियों के घर्षण से जो संगीत बनती है. सही में, दिलचस्प होती है. नितिन सिंह की वो बात आज भी मन के भीतर बार-बार प्रतिध्वनित होती है और ट्रेन की ध्वनि बैकग्राउंड म्यूजिक बनकर उसे और असरदार बना देती है.

नितिन को देखने के लिए सबके पास अलग-अलग चश्मे होंगे लेकिन मैं उसे अपनी आंखों की बजाय दिल से देखना पसंद करूंगा. इंटर्नशिप का दौर बहुत ही बोझिल होता है. जो इसे मजे से कर ले! उनका अपना हिसाब किताब होता है. लेकिन मीडिल क्लास फैमिली में पैदा हर युवा नौकरी के सारे संभव दरवाजों को खटखटाता है. उसका भरसक प्रयास रहता है कि कुछ भी करके कहीं इंटर्नशिप एक्सटेंड हो और जाॅब की संभावनाओं का रास्ता कहीं से तो खुले.

ऐसे कठिन समय में वो नितिन ही रहा. जिसका अबोध हंसता चेहरा हमारी हंसी का कारण बनता. उसकी बातें इतनी चुटकुलेनुमा होती कि हास्य का उद्भव संभव हो जाता.

Published by Abhijit Pathak

I am Abhijit Pathak, My hometown is Azamgarh(U.P.). In 2010 ,I join a N.G.O (ASTITVA).

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