ITMI संस्मरण: ‘दो रूहों के मिलन की जुड़वा पैदाइश है’!

((स्वाति ये लाइनें गुलजार की लिखी हुई हैं. मैंने तुम्हारा परिचय देने में इससे सहायता ली है. इसको पूरा पढ़ने के बाद ही इसका हेडर समझ आएगा.))

ITMI संस्मरण मेरे लिए एक मौलिक संपदा के तौर पर है. मौलिक संपदा माने ऐसा कुछ जो सिर्फ आपके ही पास हो. आज बात गुरूदेव रवींद्र की सरजमीं से आई स्वाति पांडेय की. आवाज़ में एक मद्धम सी खनक और मन से बेहद खूबसूरत स्वाति पांडेय की. स्वाति के साथ बिताए हरेक लम्हे मेरे लिए खास हैं और रहेंगे भी. लेकिन कुछ बड़े ही संस्पर्शी रहे हैं. हेमंत सर ने अपने दो प्रजेंटेंशन में मेरा नाम स्वाति पांडेय और प्रीति सिंह के साथ डाल दिया. पहला प्रजेंटेशन इमरजेंसी के ऊपर था और दूसरा पाकिस्तानी टेरर आउटफिट्स पर.

पहले में तो तीनों साथ रहें और कायदे से आपातकाल आने की वजहों, उसके दौरान की स्थितियों और सतहत्तर के चुनाव में इंदिरा की हार का हमने बढ़िया प्रजेंटेशन तैयार किया. दूसरे प्रजेंटेशन में प्रीति सिंह किसी कारणवश नहीं आ पाई तो प्रजेंटेशन मुझे और स्वाति को ही देना था. और प्रीति के साथ कोई दुर्घटना हुई इसलिए देर रात तक हमें प्रीति के हिस्से के भी स्लाइड्स तैयार करने पड़े. मैंने स्वाति से कहा आप चार आतंकी समूहों के बारे में बता दीजिएगा और मैं छः. वो इस बात पर अडी रही कि नहीं पांच पांच दोनों बता देते हैं. आखिर में वो मानी नहीं और अपने हिस्से का उन्होंने ही बताया.


कुछ घटनाक्रमों को यदि अपवाद के तौर पर छोड़ दिया जाए तो स्वाति पांडेय से मेरे अच्छे ताल्लुकात रहे हैं और आज भी हम एक दूसरे की निजता का बहुत सम्मान करते हैं.

अब साथ में नितिन सिंह जैसे नमूने भी रहे तो लाजमी है कि अपनी हरकतों से कहानी में मसाला ला ही देंगे. भाई साब माने नहीं. एक दिन गौतम, मैं, मयंक और नितिन पास के एक ढाबे पर खाना खाने गये. अब अपनी तो यारी ही पूंजी है. बाकी हमेशा तो मन उद्विग्न ही रहता.

नितिन ने मुझसे कहा कि अभिजीत ये हरी मिर्च खाकर दिखा सकते हो. मैंने कहा कि हां खाने के साथ तो खा ही जाएंगे. नितिन ने फिर कहा कि नहीं अगर हमें सही में अपना दोस्त मानते हो तो ऐसे ही खाकर दिखाओ. मैंने मिर्च का एक हिस्सा खाने की कोशिश की लेकिन परिणाम क्या निकला कि आंखों से आंसू बंद ही नहीं हो रहे. पानी पी रहा. मीठा भी खाया लेकिन कुछ असर ही नहीं. अब इसका नितिन ने कब वीडियो बना लिया पता ही नहीं चला. जब शाम को ज्योत्स्ना और स्वाति वगैरह हम सभी चाय पीने टफरी वाले के पास पहुंचे तो नितिन ने वही वीडियो स्वाति को ये कहकर दिखा दिया कि हम लोगों ने पाठक से कहा कि स्वाति से प्यार करते हो तो ये मिर्चा खाकर दिखाओ और वो खा गया. अब इसके बाद क्या था! पूरे क्लास में इस बात की झूठी अफवाह फैल ही गई.

इन सबके बाद भी स्वाति पांडेय से हमारी दोस्ती में लेशमात्र भी असर नहीं पड़ा. प्यार व्यार तो बहुत बड़ी चीज़ होती है लेकिन स्वाति, स्मृति, गौतम और भोजक से एक खास लगाव रहा. ऐसा कि इनके बारे में कुछ बुरा सुनना पसंद नहीं था. प्यार तो करना बहुत आसान होता है लेकिन आजकल लोग सम्मान नहीं करते. वर्तमान में सम्मान पा लेना बड़ी बात है और इस मामले में मैं बेहद खुशनसीब हूं.

मुझे आज भी याद है कि स्वाति पांडेय आईचौक में इंटर्नशिप के दौरान मेरे डेस्क पर आई, शायद उनका उस समय आजतक के डिजिटल में हो गया था. और उन्होंने मुझसे पूछा अभिजीत तुम्हारा कैसा चल रहा है, मैंने कहा स्वाति मैं तो सौ फीसदी मेहनत दे रहा हूं अब आगे इनके रवैये से तो नहीं लग रहा. स्वाति की उस जरा सी हमदर्दी का अपनत्व आज भी मेरे लिए बेशकीमती बना है. मैं हमेशा अपनी शुभेच्छाएं उनके हित में और लाभ में देता रहूंगा. कोशिश रहेगी कि ताउम्र इस सहज रिश्ते को सुचारू रूप से जारी रखूं. प्यार के नहीं सम्मान के रिश्ते को!

Published by Abhijit Pathak

I am Abhijit Pathak, My hometown is Azamgarh(U.P.). In 2010 ,I join a N.G.O (ASTITVA).

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