एक ‘अज्ञानी’ प्रधानमंत्री के भरोसे मत बैठिये!

2014 के बाद भारतीय राजनीति आस्था का विषय बना दी गई है. अनहद भक्तियुग! कोई प्रधानमंत्री के झूठे दावे के खिलाफ नहीं बोलेगा? नहीं तो उसे गालियाँ दी जाने लगेंगी. उनके अतार्किक और अज्ञानी बातों पर सवाल उठा दे तो उनके समर्थक जान से मारने की धमकियाँ देंगे! एनडीए सरकार की विफलताओं पर बोलने परContinue reading “एक ‘अज्ञानी’ प्रधानमंत्री के भरोसे मत बैठिये!”

दुनिया जिसे कहते हैं!

जो लोग दुनिया की जानकारियों की समझ विकसित कर लेते हैं; उन्हें एक समय बाद राष्ट्रीय समस्याओं में उतनी दिलचस्पी नहीं रह जाती. क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ होने के बाद देश के मुद्दे गौण लगने लगते हैं. या यूँ कहे कि राष्ट्रीय मुद्दों से आपका सरोकार और दिलचस्पी धीरे-धीरे घटने लगती है. आज एकContinue reading “दुनिया जिसे कहते हैं!”

21 फरवरी की डायरी से

मुझे नहीं मालूम कि माया का फंदा किसको फांस रहा है और कौन इसकी चपेट से बाहर है; लेकिन अपने जीवन और इससे मिले अनुभवों से इतना जरूर जान गया हूं कि विषय-विकार सब पर हावी है. किसी चीज़ की कामना ही विषय विकार है; और सोचिए कौन यहाँ उससे बच सका है? किसी कीContinue reading “21 फरवरी की डायरी से”

ये जो ‘टूलकिट’ है!

विरोध के स्वर लोकतंत्र के लिए जरूरी होते हैं और जो हमारा संविधान है, उसमें आलोचना करने की पूरी छूट दी गई है. अगर आप टूलकिट को लेकर परेशान हैं तो सोचिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी ब्रिटिश हुकूमत की ज्यादतियों के खिलाफ एक खास रणनीति यानी टूलकिट बनाई थी. पत्रकार गांधी ने भीContinue reading “ये जो ‘टूलकिट’ है!”

राजनीतिक प्रवक्ताओं की फूहड़ भाषा और संवाद-प्रहरी!

भाषा, साहित्य और संवाद के लोगों से तो शब्द-मर्यादा की उम्मीद रहती ही है. फिर कोई संवाद का आदमी प्रतिवाद और हस्तक्षेप पाकर अपना आपा खो बैठे तो फिर क्या कहा जाए. राजनेताओं और अभिनेताओं ने तो भाषा को रसातल में फेंक ही दिया है पर लेखकीय समुदाय तो इसकी गरिमा को बचाए रखे. लोकContinue reading “राजनीतिक प्रवक्ताओं की फूहड़ भाषा और संवाद-प्रहरी!”

रोने की आदत मनुष्य के विकासवाद को रोक देती हैं!

आशाओं के तिनकों से जो आशियाने बनाये गये वो कभी धराशायी होकर भी ताश के पत्तों की तरह नहीं बिखरे, वो बहुत देर तक वहीं पड़े रहे. जैसेकि एक अच्छी परवरिश कभी आपको गलत रास्तों पर जाने नहीं देतीं. जब हम अपने परवरिश के मीनार पर आशाओं को आकृति देना शुरू करते हैं ना तोContinue reading “रोने की आदत मनुष्य के विकासवाद को रोक देती हैं!”

कलाकार विश्व नागरिक होते हैं!

कलाकार किसी देश के नहीं होते, वो सीमा रेखाओं में नहीं समाते. उनके चाहने वाले सीमाओं के पार के भी होते हैं! कलाकार विश्व नागरिक होते हैं. अभिनय, संगीत का कुछ ऐसा तारतम्य है कि जहां मन बिंध गया; उसे ही अपना बना लेता है. क्या पाकिस्तान; अमेरिका, क्या कोरिया; क्या जापान. आज जो लोगContinue reading “कलाकार विश्व नागरिक होते हैं!”

2 फरवरी की डायरी से

इंसान बहुत सारी चीजों को चुपचाप इसलिए भी स्वीकार कर लेता है कि उसके पास कोई विकल्प नहीं होता, वो निहायत मजबूर होता है. जिस माँ बाप ने आपको इस काबिल बनाया हो कि आप अपना अच्छा बुरा समझने के लायक बनें; जब उन्हें आप की जरूरत महसूस हुई तो आपने उनसे दूरी बना लीContinue reading “2 फरवरी की डायरी से”

मेरे घर का बंटवारा!

बात 2003 की है. ये वही साल था; जब मेरे घर में ज्ञात पीढ़ियों में पहली बार बंटवारा हुआ था. मेरी उम्र उस समय नौ साल की थी. मुझे थोड़ा धुंधला ही सही लेकिन सब याद है. नवंबर का महीना था. अगले साल मई के महीने में ही मेरी बड़ी बहन यानी ब्यूटी दीदी कीContinue reading “मेरे घर का बंटवारा!”

हमें नाज़ है अपने गांधी पर!

बीजेपी की गोडसे समर्थक सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने कई बार बापू पर आपत्तिजनक बयान दिया है. बीजेपी को आज तक इन बयानों पर खेद जताने का समय नहीं मिल सका. जबसे प्रधानमंत्री मोदी आम चुनाव में जीतकर आए हैं. भारत के महान व्यक्तित्वों को सरेआम बदनाम करने की नापाक कोशिशें जारी हैं. कोई पंडितContinue reading “हमें नाज़ है अपने गांधी पर!”