मुंबई वाले बाबा और पापा की बीच कुएं का पानी पीने की जिद्द!

छोटे दादाजी यानी बाबा को हम प्यार से मुंबई वाले बाबा बुलाते. मुंबई में नौकरी करने की वजह से ही उन्हें ये नाम दे दिया गया. एक चर्चा में मुझे जब मालूम चला कि उन्हें आखिरी सैलरी सिर्फ़ साढे बारह हजार रुपये ही मिली और कुल जमा छ: लाख पीएफ डिपाॅजिट. तो हैरान रह गया. मेरे हिसाब से वो 2001 या दो में रिटायर्ड हो गये थे और उन्होंने चालीस साल सेंचुरी कंपनी के मुंबई स्थित दफ्तर में काम किया था. यानी 1961 में जब उन्होंने नौकरी शुरू की होगी तो सैलरी बड़ी मामूली ही रही होगी. उन्होंने बंटवारे के बाद हम लोगों को भले छोड़ दिया या अपने परिवार से मोह कर बैठे लेकिन उनकी कर्तव्यनिष्ठा पर सवाल उठाने का हमें कोई हक नहीं है.

मुंबई में उन्होंने फ्लैट भी लिया, वो जिस भी कीमत का हो. वो उनके मेहनत और धैर्य के आगे कुछ भी नहीं. हमें उनका आदर करते रहना चाहिए. उन्होंने अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया. कम से कम चालीस साल तक तो वो साथ निभाते ही रहे और मैं जब भी घर पर रहा हूँ. लाख रंजिशें रही हों, पर कभी उनका कहना ना सुना हो! ऐसा नहीं हुआ. कोई लाख आरोप लगाये या बातें बनाये लेकिन हमने उन्हें कभी नहीं छोड़ा. एक बार गांव में ही किसी के घर से मुंबई वाले बाबा का विवाद बढ़ गया. झगड़े की नौबत आ गई. पिताजी घर पर थे, वो गए और मुंबई वाले बाबा को कहा- चाचा तू चला घरे, हम देखत हयी सबके. पापा ने पूरे मामले को संभाला और सबको शांत करवाया.

छोटी दादी इस बात के ताने भी मारतीं, कि अगर तुम्हारे पापा को मुंबई वाले बाबा कुएं से नहीं निकालते! तो तुम लोग आज मुझसे झगड़ा नहीं करते. उनके इस ताने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. पापा के बचपन का किस्सा है. साठ के दशक की बात होगी शायद. तब कुएं के पानी से ही सारा काम चलता. रहट से सिंचाई की जाती और ढेबरी लगाकर पीने का पानी रस्सियों से निकाला जाता. बड़की माई बतातीं कि पापा ने जिद्द पकड़ ली थी कि वो कुएं के बीच का जो सबसे साफ पानी है, वही निकालने पर पीएंगे. दादी को रसोईघर के और भी करने थे. इस नाते वो गुस्से में ये कहते हुए चली आई कि जाओ पीओ बीच कुएं का पानी. फिर क्या था? पिताजी भला बड़की माई का कहा, नहीं मानते.

सो उन्होंने बीच कुएं का पानी पीने की अपनी जिद्द पूरी करने के लिए छलांग लगा दी. इनकी उम्र दस बरस से कम ही रही होगी. तैरना तब शायद आता नहीं था. नतीजा ये निकला कि पापा कुएं में डूबने लगे. किसी ने इसकी जानकारी घर पर दी. लोग रस्सी डोरी का बंदोबस्त करते, उससे पहले मुंबई वाले बाबा उन्हें बचाने के लिए कुएँ में कूद पड़े. पापा को मुंबई वाले बाबा ने अपनी जान की परवाह किए बगैर बचाया और इसके लिए बड़की माई ये किस्सा सुनाते हुए उनके प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर करते कभी ना थकती.

आगामी पीढ़ियों को इस बारे में जानकारी बनी रहे. इस नाते मैंने ये छोटा सा वाकया इंटरनेट पर शेयर किया है. उम्मीद है कि वो भाव जो पापा, मुंबई वाले बाबा के प्रति रखते और जो अनुराग मुंबई वाले बाबा बंटवारे से पहले पापा के प्रति रखा करते थे. उसमें लेशमात्र की भी कटौती किसी को नहीं करनी चाहिए!

मैं फटी हुई या रिप्ड जींस हूं!

मैं फटी हुई जींस या रिप्ड जींस हूं! मैं जींस की फैंसी वर्जन हूं. मुझे तरक्कीपसंद सोच के लड़के या लड़कियां; यहाँ तक की महिलाएं और पुरुष बड़े शौक से पहनते हैं. उत्तराखंड के नये सीएम ने मुझे सुर्खियों में ला दिया है. उनकी संस्कृति के आड़े मैं आ रही थी. सो उन्होंने एक ऐसी महिला का हवाला दिया जो मुझे पहने हुई थी. तीरथ रावत मेरी बदौलत उस महिला को ताड़ते रहे! वैसे मुझे पुरुष भी पहनते हैं लेकिन अगर महिला पहनती है तो तीरथ सरीखे लोगों को उसका चरित्र निर्धारण करने और कुछ भी कहने का जन्मसिद्ध अधिकार मिल जाता है.

महिलाओं की जांघ और पुरुषों की जांघ तो एक जैसे ही होते हैं. फिर अगर मुझे महिला पहन ले तो उसकी मंशा और चलन पर संस्कृति के पहरेदार आकर वाहियात तर्क और बातें क्यों गढ़ने लगते हैं. मुझे बहुत अच्छा लगा जब लैंगिक समानता की पक्षधर महिलाएं तीरथ के बेहूदे कमेंट के बाद सोशल मीडिया में उस सोच और सड़ी मानसिकता का विरोध मुझसे सुसज्जित होकर करने लगी. मैं फूले नहीं समा रही थी जब तीरथ की फजीहत हो रही थी और लिंगभेद के खिलाफ मेरी बदौलत ही आज छोटा ही सही एक आंदोलन चल सका. भारत की संस्कृति का हवाला देकर मुझे बाहरी बताने वाले लोगों से मेरा सवाल है कि जब सिलाई कला अस्तित्व में नहीं आया था तब महिलाएं कहाँ-कहां और क्या क्या रफू करके पहनती रहीं होंगी. दरअसल; ऐसे संकीर्ण सोच की परेशानियां मुझसे नहीं है बल्कि उनके बीमारू जेहन से है.

ये जो मिथुन चक्रवर्ती हैं!

गरीबों के अमिताभ बच्चन कहे जाने वाले मिथुन चक्रवर्ती फिल्मों के स्टार हो सकते हैं लेकिन राजनीति में अवसरवादी और दलबदलू नेताओं में इनका नाम शुमार हैं. मिथुन चक्रवर्ती आज बीजेपी का दामन थाम चुके हैं लेकिन इनका राजनीतिक सफरनामा सीपीएम, कांग्रेस, टीएमसी होते हुए यहां तक पहुंचता है.

शारदा चिटफंड घोटाले में नाम आने के बाद राजनीति से संन्यास लेने वाले मिथुन दा फिर से राजनीति में आ गये. हालांकि, उन्होंने कांग्रेस के नेता प्रणब मुखर्जी के समर्थन में भी प्रचार किया लेकिन कभी कांग्रेस की सदस्यता नहीं ली. सीपीएम की सरकार के परिवहन मंत्री रहे सुभाष चक्रवर्ती के सबसे बड़े करीबियों में मिथुन चक्रवर्ती का भी नाम आता है.

सीपीएम के बाद मिथुन दा टीएमसी में आए, टीएमसी के कोटे से राज्यसभा पहुंचे लेकिन शारदा चिटफंड में नाम आने के बाद इस्तीफा दे दिया. ज्योति बसु सरकार में भी मिथुन चक्रवर्ती होप 86 नाम से बड़ा कैंपेन चला चुके हैं. मिथुन कई बार खुद को वामपंथी बता चुके हैं.

अब बीजेपी में शामिल होने के बाद उनका वामपंथ लोप हो गया हो तो वो अलग बात है. कुल मिलाकर मिथुन चक्रवर्ती का राजनीतिक सफर पंचमेल खिचड़ी की तरह रहा है. 70 साल के राजनेता और अभिनेता को आगे कितनी सफलता मिलती है, देखने की बात होगी?

महिला दिवस का सुरूर!

महिला दिवस आने वाला है. कुछ महिला लेखिकाओं में अचानक नारीवाद उफान मारेगा. दुनियाभर की महिला लेखिकाएं भी हफ्ते भर से सक्रिय दिखाई दे रही हैं. काश! ये मुहिम दिन रात चलाई जाती और इसी ऊर्जा के साथ! तो शायद नारी अस्मिता का आकाश पूरी तरह से साफ दिखाई देता.

फेमिनिज़म में विश्वास रखने वाले लोग औरत और मर्द दोनों हो सकते हैं. इसी तरह महिलाओं के अधिकारों को छीनने वाले भी सिर्फ़ पुरूष ही नहीं होते, महिलाएं भी होती हैं. बलात्कार यानी रेप के वो मामले जो जबरन होते हैं, उनपर बात करना जरूरी है! लेकिन आपको ये सुनकर हैरानी होगी कि शादी के बाद दुनिया के 70 फीसदी मर्द अपनी पत्नी के ही साथ जबरन सेक्स करते हैं यानी रेप करते हैं.

अमेरिका और यूरोप में इन मसलों पर बात होती है. भारत सरीके देशों में भी इसपर बहस की जानी चाहिए. शादी, अगर रेप का सर्टिफिकेट बनकर रह गया है और शादी के बाद महिला को समाज के डर से बलात्कार जैसे वीभत्स अपराध को सहना पड़ रहा है. तो नारीवाद को मुखर होने की जरूरत है.

कार्यस्थल पर महिलाएं अपनी सहकर्मी महिलाओं को चुपचाप प्रताड़ित या शोषित होती देखती हैं. उनके लिए आवाज़ नहीं उठाती. कई मामले तो ऐसे भी हैं. जिनमें महिलाएं पुरुषों के साथ मिलकर अपनी जूनियर का शोषण करती हैं. ये शर्मनाक है.

तो ये ख़याल मन से निकाल देना होगा, कि सारे मर्द और महिलाएं एक जैसी होती हैं. ये बात भी अजीब है कि महिला विमर्श की बातें सिर्फ औरतें ही करेंगी. सबसे मूलभूत समस्या यही है. कुछ सांस, जिनके बेटे सिर्फ उनकी सुनते हैं वो खुद की बहू का शोषण कर रही है. अलबत्ता, वो पति! जो अपनी बीवी की ही सुन और कर रहा है अपनी बुजुर्ग मां को जीभर के प्रताड़ना दे रहा है.

हम भारतीयों का मनोविज्ञान यही है कि हम बिना केस स्टडी मसलों पर अवधारणा बना लेते हैं. जोकि पूरी तरह से अनुचित है. ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जिसमें महिलाएं अपने विशेषाधिकारों का गलत इस्तेमाल करती पायी गई. किसी अच्छे भले इंसान को झूठे दहेज केस में फंसा दिया.

उन्हें ये बात पता है कि महिलाओं की खूब सुनी जाती है. ये अपवाद भी नारीवाद को लचर कर रहे हैं. महिलाओं को उनका हक बिना भेदभाव के चाहिए और यही एक आदर्श व्यवस्था के लिए जरूरी भी है. लेकिन महिलाओं को भी पुरुषों के अधिकारों को छीनने की कुत्सित चेष्टा को छोड़ना होगा.

एक ‘अज्ञानी’ प्रधानमंत्री के भरोसे मत बैठिये!

2014 के बाद भारतीय राजनीति आस्था का विषय बना दी गई है. अनहद भक्तियुग! कोई प्रधानमंत्री के झूठे दावे के खिलाफ नहीं बोलेगा? नहीं तो उसे गालियाँ दी जाने लगेंगी. उनके अतार्किक और अज्ञानी बातों पर सवाल उठा दे तो उनके समर्थक जान से मारने की धमकियाँ देंगे! एनडीए सरकार की विफलताओं पर बोलने पर लोग उसे सोशल मीडिया पर ट्रोल करेंगे और तमाम तरह से परेशान करना शुरू कर देंगे. देश गर्त में जा रहा है लेकिन कोई आवाज़ ना उठाये. ये लोकतंत्र है और बतौर भारतीय नागरिक हम अपनी सरकार से सवाल पूछने के लिए प्रतिबद्ध हैं और पूछेंगे भी!

युवाओं को देश की समस्याएं जाननी होंगी और उसके समाधान की तरफ़ कोई कदम उठाना होगा. हमें एक प्रधानमंत्री के भरोसे नहीं बैठना चाहिए और ऐसे प्रधानमंत्री के भरोसे जो ज्वलंत विषयों पर गंभीरता नहीं दिखाता बल्कि बहुसंख्यक आबादी को अपने खेमे में मिलाने के लिए तमाम संप्रदायों में बिखरी भारतीय अस्मिता को कपड़े से पहचानने की बात करते हैं. 35 साल तक भिक्षा मांगकर जीवन यापन करने की बात करेंगे. एक युवा भिक्षा मांगे; ये उचित नहीं है. उसकी आत्मा में अगर जरा सा भी जीवन शेष होगा वो काम करेगा.

सैंकड़ों वीडियो ऐसे मिल जाएंगे जिसमें पीएम मोदी खुद कहते हैं कि हाईस्कूल से ज्यादा पढ़ाई नहीं हो पाई लेकिन अमित शाह उनके सर्टिफिकेट पर पीसी करने जरूर आएंगे. विश्व स्वास्थ्य संगठन कह रहा कि किसी पारंपरिक दवा को वो सर्टिफाई नहीं करेगा. लेकिन कोरोनिल के प्रचार के लिए हमारे दो कैबिनेट मंत्री मुस्तैदी के साथ उसका विज्ञापन करेंगे.

नाली के गैस से चूल्हा जलाने वाले प्रधानमंत्री पर स्पूफ बने तो लोग आगबबूला क्यों होते हैं. वायुमंडल के गैस से पानी बनाने वाले पीएम पर विज्ञान युग उपहास क्यों नहीं कर सकता. बादल घिरने पर रडार काम नहीं करेंगे किसी भौतिकविद् से ये बात पच सकती है. बच्चों को परीक्षा पर टिप्स देनी है लेकिन खुद का जीके इतना कबाड़ बना दिए हैं उसपर कोई सवाल करे तो उसे देशविरोधी घोषित कर देंगे.

राष्ट्रवाद की अफीम का नशा होता ही ऐसा है कि सब कुछ लुटते हुए भी लोगों को हकीकत पर भरोसा नहीं होता. भारतीय अर्थव्यवस्था की जो वर्तमान स्थिति है; वो बेहद चिंताजनक है. बेरोजगारी की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ. वो दिन दूर नहीं जब भारत सरकार का रवैया ब्रिटिश हूकूमत की तरह ही दिखेगा. अखबार उठाकर पढ़िए, लगेगा रामराज्य आ ही गया है लेकिन जब आप उस व्यवस्था का जायजा खुद करने जाएंगे तो सब कुछ फरेब लगेगा. सभी दावे झूठे लगेंगे. सभी सरकारी नीतियों के विज्ञापन धोखेबाजी करते नज़र आएंगे.

दुनिया जिसे कहते हैं!

जो लोग दुनिया की जानकारियों की समझ विकसित कर लेते हैं; उन्हें एक समय बाद राष्ट्रीय समस्याओं में उतनी दिलचस्पी नहीं रह जाती. क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ होने के बाद देश के मुद्दे गौण लगने लगते हैं. या यूँ कहे कि राष्ट्रीय मुद्दों से आपका सरोकार और दिलचस्पी धीरे-धीरे घटने लगती है. आज एक बहुत ही दिलचस्प खबर आई ट्यूनीशिया से. जहाँ पर एक डाॅक्टर अस्पताल में मरीजों को हिम्मत और हौसला बनाये रखने के लिए वायलिन बजाकर सुनाते हैं. वायलिन की धुन सुनने के बाद कैंसर और कोरोना के दोहरी मार को झेल रहे मरीज खिलखिला उठते हैं. ऐसा लगता है मानो उन मरीजों को; जो जिंदगी से नाउम्मीद हो चुके हैं, दवा से भी जरूरी वायलिन की धुन की जरूरत है. दुनिया को ऐसा ही होना चाहिए. दूसरों के काम ना आ सकें तो फिर इंसान होने का फायदा ही क्या है?

चुनाव में हार के बाद अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति पहली बार किसी कार्यक्रम में शिरकत करने जा रहे हैं, लेकिन ये अमेरिका के लोकतंत्र की ही शक्ति है कि उनके भड़काऊ बयानों के लिए उनके अपने लोग भी उनसे खफा होकर बैठे हैं. ईरान भी कमाल का देश है! अमेरिका से परमाणु समझौते को लेकर असहमति को आज यूएन के न्यूक्लियर चीफ पर निकाल दिया. मानिटरिंग की मकसद से लगाए उनके सर्विलांस कैमरे को दो बार बंद किया गया. इससे साफ जाहिर है कि ईरान के राजनेताओं की अमेरिका से किस हद तक ठनी है. अमेरिका को बार बार धमकियाँ देने वाले टर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन के रुख में भी नरमी देखने को मिली, अब वे भी अमेरिका के साथ मिलकर आगे बढ़ने की मंशा दिखा रहे हैं.

अमेरिका में बंदूक को ट्रंप प्रशासन ने खिलौना बनाकर रख दिया था. जब से बाइडेन राष्ट्रपति बने हैं; बेतहाशा बंदूकें खरीदने पर सख्ती दिखा रहे हैं. जिसके चलते आज न्यू आर्लियंस के एक गन स्टोर में ही हमला हो गया. क्रॅस फायरिंग में हमलावर तो मारा गया लेकिन दो लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी. वहीं; 2017 से गृहयुद्ध झेल रहे अफ्रीकी देश नाइजर में आज राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान हुआ. अमीर देश सर्बिया के पास आज चार तरह की वैक्सीनें उपलब्ध हैं. स्पुतनिक, सायनोफार्म और फाइजर की तो पहले ही मंगवा चुके थे; आज वहाँ के राष्ट्रपति एलेक्जेंडर वुसिक खुद एयरपोर्ट पहुँच एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन का जायजा लेने पहुंचे थे.
आज आस्ट्रेलियन ओपन में नोवाक जोकोविच 9 वीं बार चैंपियन बनकर मेन्स सिंगल्स का खिताब अपने नाम किया.

मुझे लगता है कि भारत के युवाओं की संकीर्ण सोच को विकसित करने और बेकार के घरेलू मुद्दों में उलझनें से बेहतर है कि वे विश्व नागरिक बने और दुनिया को जानने की कोशिश करें. मेरा दावा है कि अध्ययन और अनुभव दोनों मजेदार होगा!

21 फरवरी की डायरी से


मुझे नहीं मालूम कि माया का फंदा किसको फांस रहा है और कौन इसकी चपेट से बाहर है; लेकिन अपने जीवन और इससे मिले अनुभवों से इतना जरूर जान गया हूं कि विषय-विकार सब पर हावी है. किसी चीज़ की कामना ही विषय विकार है; और सोचिए कौन यहाँ उससे बच सका है? किसी की कामना संपत्तियों के लिए है तो कोई नाम और शोहरत के लिए बेचैन है. किसी को अच्छा जीवनसाथी चाहिए तो कोई सर्वेसर्वा बनने की होड़ में लगा है.

गीता में लिखा है कि लोग इसी माया के फांस से बाहर नहीं निकल पाते. और खुद को साधारण घोषित कर देते हैं. ये मेरा भोगा हुआ अनुभव है. विशेष व्यक्ति सिर्फ किसी पद प्रतिष्ठा पाने के बाद घोषित नहीं किया जाना चाहिए और ना ही किसी अनुभव के आधार पर. कोई विशेष या महान तब माना जाये जब उसके पास विषय विकार से दूर रह सकने की कुशलता मिल जाये. महान या विशेष व्यक्तित्व वही बनाया जाए जो काम, क्रोध, मद, लोभ के प्रभाव में ना आता हो.

जिसके जीवन में सिद्धांत और मूल्यों के लिए भरपूर जगह हो. और इन्हीं रास्तों पर चलने वाले लोगों का अनुकरण किया जाए. मुझे पूरा भरोसा है कि जिस रोज लोग संतोष, सब्र और धैर्य के हथियार से कामनाओं का वध करने वाले बन जाएंगे; उस दिन कहीं अपराध नहीं होगा. किसी राज्य में कोई भूखा नहीं सोयेगा. सभी सुखी; संपन्न और समृद्ध बन जाएंगे. जिस रामराज्य की हम हजारों साल से परिकल्पना कर रहे हैं; वो हमारी आंखों के सामने वास्तविकता की परिधि कर लेगा.

शुभरात्रि!

ये जो ‘टूलकिट’ है!

विरोध के स्वर लोकतंत्र के लिए जरूरी होते हैं और जो हमारा संविधान है, उसमें आलोचना करने की पूरी छूट दी गई है. अगर आप टूलकिट को लेकर परेशान हैं तो सोचिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी ब्रिटिश हुकूमत की ज्यादतियों के खिलाफ एक खास रणनीति यानी टूलकिट बनाई थी. पत्रकार गांधी ने भी चंपारण में तीन कठिया का विरोध किया था, और नील की खेती के खिलाफ गांधी की आवाज़ में बहुतेरे लोग शामिल हुए. वो देश के लोग भी थे और विदेश के लोग भी थे. मानता हूँ कि तब देश गुलाम था और मनमर्जियों का सितम इस कदर भी नहीं था. लेकिन सोच के देखिए कि भारत में आर्थिक गुलामी का माहौल बनता नहीं दिख रहा है. किसानों का बिल और उनके आंदोलन को कुछ समय के लिए नजरअंदाज़ कर लीजिए मगर उसके अलावा भी अगर आप भारत की अर्थव्यवस्था से जरा भी पढ़ते या समझते होंगे तो आपको ये बताने की जरूरत बिल्कुल भी नहीं है कि; देश की आर्थिक स्थिति आज बद से बदतर हो चुकी है.

महंगाई बढ़ती जा रही है लेकिन मीडिया के पास सरकार को डिफेंस करने के अलावा कुछ सूझता ही नहीं. खेतीबाड़ी पर कार्पोरेट कंपनियों के नियंत्रण से स्थितियां भले कुछ दिनों के लिए सुधर जाएं लेकिन आगे जाकर निश्चित तौर पर मुश्किलें खड़ी होंगी. अगर सरकार किसानों का हित चाहती है तो उन्हें उनके अनाज का उचित दाम दिलवा दे. जमाखोरी और बिचौलियों को खत्म करने का कोई ठोस कदम उठाये. ये कानून तो जमाखोरी को और बढ़ावा देने वाले ही हैं. गरीब अमीर के बीच जिस खाई को पाटने के लिए आर्थिक बजट तैयार होता था; उसमें गरीबों के उत्थान का कोई जिक्र ही नहीं है.

ग्रेटा थनबर्ग और दिशा रवि दोनों पर्यावरण को बचाने और जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दों की लड़ाई लड़ रही हैं. अगर व्यक्तिगत तौर पर उन्हें इस कानून से आपत्ति है तो भी उन्हें इस तरह गिरफ्तार करना न्यायसम्मत नहीं है. सरकारों की आलोचना हर दौर में हुई है और होती रहेगी. वो विष्णु के अवतार नहीं हैं कि उनके खिलाफ बोलना सही नहीं.

भारत में समस्या इस बात की है कि युवावर्ग लंपट है. वो विषय को पढ़े लिखे बिना ही तर्क करने बैठ जाता है और किसी भी मुद्दे पर अवधारणा बना लेता है. उसे भरपूर अध्ययन की जरूरत है. पीएम मोदी से प्रेम कीजिये लेकिन उन्हें भगवान तो मत बना दीजिये. कि उनके खिलाफ किसी की आवाज़ उठने पर आप भारत दुर्दशा पर भी चुप बैठे रहे. ये देश रहेगा तो बहुत सारे प्रधानमंत्री बनेंगे. अगर देश के स्वाभिमान और मूल्यों से खिलवाड़ हो तो हम सबका दायित्व है कि उसके खिलाफ आवाज़ बुलंद करें. ये ना देखें कि भीड़ उनके साथ है. बल्कि ये देखें कि उचित और राष्ट्र हित में क्या है!

शुभरात्रि…

राजनीतिक प्रवक्ताओं की फूहड़ भाषा और संवाद-प्रहरी!

भाषा, साहित्य और संवाद के लोगों से तो शब्द-मर्यादा की उम्मीद रहती ही है. फिर कोई संवाद का आदमी प्रतिवाद और हस्तक्षेप पाकर अपना आपा खो बैठे तो फिर क्या कहा जाए. राजनेताओं और अभिनेताओं ने तो भाषा को रसातल में फेंक ही दिया है पर लेखकीय समुदाय तो इसकी गरिमा को बचाए रखे. लोक व्यवहार में अगर कहीं भाषायी सौंदर्य में अक्खड़पन हो तो उसे भी लिखा जाना चाहिए जैसेकि काशीनाथ सिंह ने कासी के असी में किया है. पर व्यक्तिगत तौर पर तो कम से कम अपनी गरिमापूर्ण व्यक्तित्व और पेशे का खयाल तो रखना ही चाहिए. जो लोग शब्द पर काम करते हैं, वे देवी सरस्वती के उपासक माने जाते हैं. उनके मुखारबिंद से किसी के लिए अपमानजनक बातें शोभा नहीं देतीं. हस्तक्षेप और वाद-प्रतिवाद तो पत्रकारिता के साजो-श्रृंगार होते हैं. राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता लाइव डिबेट में अपना असली चेहरा यदा-कदा प्रकट करते ही रहते हैं. हाथापाई की भी नौबत आ ही जाती है. ये भाषायी संकुचित का सबसे बड़ा उदाहरण है. प्रवक्ता और नेता की शोभा उच्चकोटि की भाषा से होती हैं. अनर्गल और स्तरविहीन बातें उनके पद को म्लान करती हैं. हालांकि टीवी डिबेट में ये तौर तरीके प्रवक्ताओं के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं क्योंकि ज्यादातर लोग टीवी पर ड्रामा ढूंढ़ते हैं. उन्हें इन कारनामों पर हास्य की अनुभूति मिलती है जिसे वो खोना नहीं चाहते. यही कारण है कि संवाद का प्रहरी यानी एंकर जानबूझकर ऐसी नौबत आने देता है.

रोने की आदत मनुष्य के विकासवाद को रोक देती हैं!

आशाओं के तिनकों से जो आशियाने बनाये गये वो कभी धराशायी होकर भी ताश के पत्तों की तरह नहीं बिखरे, वो बहुत देर तक वहीं पड़े रहे. जैसेकि एक अच्छी परवरिश कभी आपको गलत रास्तों पर जाने नहीं देतीं. जब हम अपने परवरिश के मीनार पर आशाओं को आकृति देना शुरू करते हैं ना तो कुछ अद्भुत कलाकृति बनकर निकलती है. इंसान पत्थर से मिलकर तो बना नहीं है कि उसे तकलीफ़ का असर नहीं होता और उसकी वेदना पर घात की गई चोटें नहीं उकरतीं.

रोना तो मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है; लेकिन इसे छोड़ देने की जरूरत है. आजकल लोग रुदन को व्यक्तित्व की कमजोरी समझ लेते हैं. कौन सा महापुरुष आंसू के शबनम से मुखभाग को नहीं सींचा है. तो फिर रोना कमज़ोर होने का प्रमाणीकरण कभी नहीं हो सकता. फिर भी रोने की जरूरत नहीं. क्योंकि जिसे हम अपना भाई; पिता या रिश्तैदार समझ के नाउम्मीद होने पर रो बैठते हैं. वो सिर्फ एक आदमी है. जिसे अपनी अहमियत के अलावा कुछ नहीं भाता. उस पर माया और मोह की बंदिशों का अतिक्रमण है. इसलिए उन सबके लिए अपने मोती जैसे अश्रु बहाना कदापि उचित नहीं ठहराया जा सकता.

लोग अपने अप्रतिम से बिछड़ते वक्त भी दुखी होते हैं; और कुछेक तो इस कदर की चिल्ला चिल्लाकर रो पड़ते हैं. उन्हें भी किसी यात्रा पर निकलने वाले अपने प्रिय को इस तरह विदा नहीं करना चाहिए. अशांत मन की यात्राएं जिज्ञासाविहीन होती हैं और जिस यात्रा में जिज्ञासा मर जाए, उसका मकसद कभी पूरा नहीं होता. यात्राएं हमारे मन उद्दीपन का दीया होती हैं. उसके जलने से हमारे भीतर आशावाद का संचार होता है. इसलिए विदाई के समय निरर्थक रोना भी उचित नहीं.

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