कलाकार विश्व नागरिक होते हैं!

कलाकार किसी देश के नहीं होते, वो सीमा रेखाओं में नहीं समाते. उनके चाहने वाले सीमाओं के पार के भी होते हैं! कलाकार विश्व नागरिक होते हैं. अभिनय, संगीत का कुछ ऐसा तारतम्य है कि जहां मन बिंध गया; उसे ही अपना बना लेता है. क्या पाकिस्तान; अमेरिका, क्या कोरिया; क्या जापान. आज जो लोग किसानों के आंदोलन पर विदेशी कलाकारों को उनकी हदें बता रहे हैं. उन्हें अपनी विचार सीमाओं को और विकसित करने की जरूरत है. कोरोना महामारी के वक्त जब दुनिया में हौसले की कमी महसूस हुई. दुनिया भर के संगीतकारों ने एक स्वर में उम्मीद भरे गाने गाये. उसमें रिहाना भी थी और इससे जो फंड इकट्ठा हुए; वो किसी एक देश में स्वास्थ्य बहाली के लिए नहीं खर्च हुए. उन पैसों ने सीमाओं को तोड़ लोगों की परेशानी दूर किये.

मिया खलीफा पर भद्दे मीम बनाने और घटिया सोच रखने वाले खुद का आत्ममंथन करें और ये जरूर सोचे कि मिया खलीफा ने भले ही अपने जिस्म का सौदा कर दिया हो लेकिन अपनी आत्मा की नीलामी तो नहीं कीं. महीनों से आंदोलनरत किसानों के हित में बोलना उनके दयाभाव को प्रदर्शित करता है. पाकिस्तान में बलोचों पर अत्याचार होता है तो दुनिया थूकती है ना! तो अगर आज खेती किसानी में बाजारवाद का मुहाना खोलते समय किसानों को अपने हित की चिंता सता रही है तो कोई जरूरत नहीं उनके वजूद का तुल्यांकी भार निकालने की.

अगर आप अच्छा करेंगे तो दुनिया जिंदाबाद के नारे लगाएगी और अगर आप बुरा करने की सोचेंगे तो जो जागरूक लोग हैं; उन्हें सच की तरफदारी करनी ही होगी. अमेरिका में ब्लैक लाइव्स मैटर्स हैशटैग से कौन पत्रकार अछूता रहा. तो क्या जार्ज फ्लायड की निर्मम हत्या अमेरिका का आंतरिक मामला भर था. कोई भी मुद्दा अंतरराष्ट्रीय तब बनता है जब वो देश अपनी नीतियों की रक्षा करने में असफल हो जाता है.

सीमाओं के पार झांकना आत्मविश्लेषण और आदर्श स्थितियों की सुदृढ़ीकरण के लिए कच्चा माल तैयार करता है. इसलिए किसी भी व्यक्ति को सीमाओं से नहीं चर्चित विषयों पर जागरुकता की जानकारी हासिल करने की परिधि से जानिए. धन्यवाद

2 फरवरी की डायरी से

इंसान बहुत सारी चीजों को चुपचाप इसलिए भी स्वीकार कर लेता है कि उसके पास कोई विकल्प नहीं होता, वो निहायत मजबूर होता है. जिस माँ बाप ने आपको इस काबिल बनाया हो कि आप अपना अच्छा बुरा समझने के लायक बनें; जब उन्हें आप की जरूरत महसूस हुई तो आपने उनसे दूरी बना ली और उस दूरी का नाम रख दिया नौकरी. हम मिडिल क्लास और छोटे शहरों के लोगों के साथ ये समस्या बहुत मामूली है. दिन रात अपनी कोशिकाओं का पूरा जोर लगाकर भी आप इस लायक ना हो सकें कि अपने माँ बाप की बढ़ती उम्र में देखभाल कर सकें तो लानत है ऐसी क्षमता और पेशे पर. करीब पांच साल से मीडिया इंडस्ट्री में काबिज हूँ; लेकिन अभी तक इतनी हैसियत नहीं हो पाई कि माँ पापा को अपने बूते साथ रख सकूं. ऐसे मौके भी आते हैं जब आर्थिक तौर पर उन्हीं पर निर्भर रहना पड़ता है.

मैं अपने पापा को अब फैसले लेते हुए नहीं देखता तो मन मसोस उठता है. जिनकी एक बोल से घर पर सबकी सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती थी आज वो उम्र के इस पड़ाव में सबकी बातों को चुपचाप स्वीकार लेते हैं. एक पुत्र के तौर पर मैं पापा के व्यवहार के हमेशा करीब रहा हूँ. पापा ने बहुत प्रेरक और ईमानदार जीवन बिताया. घर बार को लेकर अपना सब लुटाते गये. जो अपने दिमाग का बेजां इस्तेमाल किये वे आज उन्हें अपने पैसे का धौंस आसानी से दिखा सकते हैं. लेकिन उनकी कर्तव्यनिष्ठा और समर्पण के सामने बहुत अदने मालूम पड़ते हैं.

आज परिस्थितियों के विपरीत होने पर सभी अपनों का चेहरा साफ-साफ दिख रहा है. सब के सब बस अपने फायदे और मौके को भुनाने के लिए पापा के पास आते थे. अगर सही में ईश्वर का अधिवास इस धरती पर है तो बस उससे इतना मांगने की जुर्रत करूँगा कि मेरे पापा और माँ को स्वस्थ और कुशल रखे; बदले में मुझे जो कुछ तकलीफें दे सकें; सहर्ष स्वीकार कर लूंगा.

मेरे घर का बंटवारा!

बात 2003 की है. ये वही साल था; जब मेरे घर में ज्ञात पीढ़ियों में पहली बार बंटवारा हुआ था. मेरी उम्र उस समय नौ साल की थी. मुझे थोड़ा धुंधला ही सही लेकिन सब याद है. नवंबर का महीना था. अगले साल मई के महीने में ही मेरी बड़ी बहन यानी ब्यूटी दीदी की शादी होने वाली थी. हमारे तीन बाबा थे. जो हमारे थे; उनको तो सिर्फ तस्वीरों में ही देख सका. बाकी दो लोगों में एक बिचले बाबा जिनका जिक्र मैं यदा-कदा अपनी डायरियों में करता रहा हूँ; वे थे. और सबसे छोटे बाबा मुंबई में रहते थे. सबका जिक्र शुरूआत में इसलिए कर दे रहा कि आपको पूरा वाकया समझने में आसानी हो.

तड़के सवेरे बिचले बाबा कचहरी जाने के लिए अपना बैग उठाये ही थे. तभी मेरी बड़की माई यानी बड़ी दादी उनके लिए चूड़ा;दूध-चीनी का हल्का नाश्ता लेकर पहुंचती हैं. अमूमन; बिचले बाबा अपनी बड़ी भाभी की किसी बात को कभी ना सुने ऐसा होते मैंने देखा ही नहीं, लेकिन उस रोज बाबा ने कुछ भी खाने से इंकार कर दिया था. माई फिर भी बिचले बाबा से ये कहकर अंदर चली गई. कि बिना खाये घर से ना निकले.

ये तीसरा दिन था जब एक मामूली विवाद के बाद घर में चूल्हा नहीं जला था. विवाद था; घर में दो चूल्हे बनाने को लेकर. बड़की माई ने इस बात से साफ इंकार कर दिया था. लेकिन बिचले बाबा पर दोनों पक्षों से लगातार दबाव बनाये जा रहे थे. शायद इसी तनाव को लेकर उस रोज भी बिचले बाबा नाश्ता करने से इंकार कर रहे थे.

खैर; बिचले बाबा से हम सभी डरते बहुत थे. लेकिन उनके गुस्से और दुलार का सामंजस्य इतना सहज था कि उनके पास जाने में कभी हिचकते नहीं थे. बिचले बाबा ने दो चम्मच भी खाया नहीं था कि मेरी नज़र उस पर चली गई. मैंने बाबा से बस इतना ही कहा- बाबा भूख लगल बा हो. और वे पूरी कटोरी मुझे थमा बैग उठाकर कचहरी निकल गये. बड़की माई तभी अचानक अंदर से आ गई. और उन्होंने बाबा का नाश्ता मुझे खाते हुए देख लिया. मैं कुछ समझ सकता कि वो गुस्से से भर गई. तोहने के कुछ ना मिलत हवे. ओनके अगवै क मिलल हवे. मैंने उनसे कहा कि माई तीन रोज से कहाँ कुछ बन रहा. जो हल्का फुल्का बनता है; उससे भूख नहीं जाती. दादी भावुक हो गई लेकिन उनका गुस्सा शायद अब भी खत्म नहीं हुआ था!

वो अमूमन कभी हाथ नहीं उठाती थी और पापा जब गुस्से में मेरी पिटाई करने आते तो वही बचाती भी थी. लेकिन शायद अपने लाडले देवर के भूखे होने की वजह से वो मुझ पर भड़के जा रही थी. उन्होंने मुझे उसी ताव में एक तमाचा दे मारा. मैंने चूड़े और दूध से भरी कटोरी बैठक में दे फेंकी. तभी अम्मा आ गयी. अम्मा; माई को अम्मा ही बुलाती थी. उन्होंने पूछा- अम्मा का भयल हव. उन्होंने कहा- बिचलकू के आगे क खायल दुश्वार कैले हवे तोहार पूत. शाम के समय घर में माई ने सबको हटाकर बहुत दिनों बाद रसोई की शोभा बढ़ाई और हम सबने छककर खाना खाया.

दूसरे दिन सुबह दिग्विजय राय के पिताजी घर आये. उन्होंने पापा और छोटे बाबा को बिठाकर समझाया कि आपके घर का क्षेत्र में बड़ा नाम है. और लोग आपके परिवार सरीखे बनने की कोशिशें करते हैं. जो भी मतभेद हैं; उन्हें भुलाकर और मिलकर रहिए. पापा ने अगले साल दीदी की शादी की वजह से उनकी बातों को स्वीकार कर लिया लेकिन छोटे बाबा ने कहा सभी लोग एक में रहेंगे तो मैं एक रुपया भी खर्च नहीं करूंगा. पापा ने इस पर भी हामी भर दी. लेकिन शाम को छोटे बाबा ने गुंजन भैया को गाय की देखरेख ना करने की वजह से बहुत डांटा और मारे भी; जिसपर अम्मा ने कह दिया कि आपके जो मुंबई वाले पोते हैं; उनसे करवा लीजिए कभी.

फिर क्या था; उस रोज मुंबई वाले बाबा के परिवार ने अलग खाना बनाया खाया. बड़की माई की आंखें उस रोज ऐसे भरभरा रही थीं मानो कि उनसे किसी ने उनका सर्वस्व छीन लिया हो. इस घोंसले को उन्होंने तिनका-तिनका चुनकर तैयार किया था; जो आज पूरी तरह बिखरा पड़ा था.

हमें नाज़ है अपने गांधी पर!

बीजेपी की गोडसे समर्थक सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने कई बार बापू पर आपत्तिजनक बयान दिया है. बीजेपी को आज तक इन बयानों पर खेद जताने का समय नहीं मिल सका. जबसे प्रधानमंत्री मोदी आम चुनाव में जीतकर आए हैं. भारत के महान व्यक्तित्वों को सरेआम बदनाम करने की नापाक कोशिशें जारी हैं.

कोई पंडित नेहरू को अनाप शनाप बोलकर निकल जाता है तो कोई महात्मा गांधी को. क्या साध्वी प्रज्ञा ठाकुर भारत की आजादी में गोडसे की भूमिका को लेकर एक लाइन भी बताने का माद्दा रखती हैं. अगर नहीं तो एक राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी का ये दायित्व नहीं बनता कि वो अपने संसदीय सदस्य से उसकी गलतबयानी पर खेद जाहिर करवा सके.

दरअसल, गोडसे को पार्टी अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे में फिट पाती है, इसलिए उस बयान का खुलकर विरोध करने से बचती रही है. दक्षिण अफ्रीका में गांधी और मंडेला के अलावा कौन वैश्विक पटल पर किर्तिमान बनाने वाला नेता बचता है? अगर आप गांधी के विरोध में कुछ कहने के लिए खुद को स्वतंत्र पाते हैं तो ये स्वतंत्रता गांधी ने ही आपको दी है किसी गोडसे ने नहीं!

भारतीय राजनीति में ऐसा दौर कभी नहीं आया जब एक महापुरुष के लिए आपत्तिजनक शब्दों के बाद भी अपने पद पर काबिज बना रहा हो. हमें नाज़ होना चाहिए उस गांधी पर जिसने औपनिवेशीकरण और समाजवाद के खिलाफ दुनिया में जागरूकता फैलाई. हमें फक्र होना चाहिए गांधी के उस राष्ट्र प्रेम पर जिसने जब एक बार ठान लिया कि स्वदेशी का कपड़ा नहीं पहनूंगा तो मरते दम तक अपने हाथों से बनाई धोती ही पहना. गांधी जिंदाबाद थे; हैं और हमेशा रहेंगे…

परिचय!

किसी का सबसे सटीक और प्राथमिक परिचय क्या हो सकता है? जहां वो पैदा हुआ, उसका नाम कुल वंश या जाति या उसका पेशा! जहां वो पैदा हुआ; उस जगह से बहुतेरे लोगों की पहचान जुड़ी हुई होगी. नाम के लोग भी तो मिल ही जाते हैं. वंश जाति भी नहीं; यहां तक की धर्म भी नहीं. किसी भी व्यक्ति की एक विशेष पहचान क्या है? ये बड़ा ही गूढ़ है. कुछ लोग कहेंगे स्वभाव और अनेकरूपता मगर स्वभाव की दृष्टि से भी तो व्यक्ति कुछ दस बारह तरह के हो सकते हैं. फिर किसी की सबसे सटीक पहचान क्या हो सकती है. हम अमूमन; अपना परिचय इसी तरह से देने के पाबंद हो गये. या फिर परिचय के सीमित मापदंड इन्हीं पर आधारित कर दिये गये. हम सभी मानव जाति से हैं. ये तो सबकी पहचान हो गई. इस गाँव या कस्बे के हैं ये भी सामूहिक पहचान ही हुई. क्योंकि गाँव तो आपके साथ औरों का भी है. फिर माता-पिता; वो तो जैविक पहचान हुई. फिर आपकी पहचान का क्या? पेशा भी तो एक जैसा कितने सारे लोगों का होता ही है. फिर किसी की सबसे सतही पहचान क्या हो सकती है? सोचिए जरा… अगर किसी अंजान द्वीप पर जो अज्ञात हो. आपको छोड़ दिया जाये. और वहां का एक व्यक्ति भी आपके भौगोलिक स्थितियों से अंजान हो. आप उसे अपने बारे में क्या बताएंगे. अपना नाम? हो सकता है कि अगला आपकी भाषा भी नहीं समझता हो. आप अपने परिचय की मौलिकता में गोते लगा लीजिए, मगर आजतक जिन परिचय के सहारे आप अकड़ते रहे हैं!

आपको आभास हो चुका होगा कि वो आपका यूनिक परिचय नहीं है. फिर कोई अपनी पहचान कैसे करे? क्या बताए कि कोई अपरिचित भी आपको उस आइडेंटिटी से पहचान सके. जहां आपको सभी जानते हैं; वहां आपका नाम और गांव ही आपके पहचान के लिए पर्याप्त है. आपका पोस्टल एड्रेस आपकी पहचान है. तो वही पता तो आपके भाई की भी होगी. फिर यूनिक आइडेंटिटी का दम कोई कैसे भर सकता है. आप सभी को क्या लगता है पहचान का कोई सिरा होता भी है क्या? कुछ जेहन में आए तो मुझे भी बताइए!

पुरबिया: प्राक्कथन- राम नाम कलि अभिमत दाता!

हमारे मनीषियों ने कहा है कि पूर्ववायुना जलद:, मतलब पूरवाई चलने से बारिश की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. मैं कहता हूँ कि पुरबिया लोक भी हर काल में संभावनाओं से भरा हुआ रहा है. पुरबिया लोक; आशा, सौहार्द और सृजन-संभावना का विशाल गढ़ है. यहां की लोक भावना कभी विदूषित नहीं रही है. वो तो भला हो सियासत का जो अपना हित साधने के लिए लोगों में विद्वेष भरती है. राम का मंदिर बने ये सभी चाहते थे; लेकिन उसके लिए हिंसा हो ये कोई नहीं चाहता था.

अगर ये काम आसानी से हुआ होता तो सनातन का नाम कलुषित ना होता. इस एक वाकये ने पुरबिया लोक को शर्मसार कर दिया. कट्टरपंथ किसी भी धर्म में पनपे जायज नहीं है. जब तुलसी रामचरितमानस लिख रहे थे, उस समय भी इस्लाम विस्तार की सोच रखने वाले बहुतेरे थे. तुलसी ने राम को अयोध्या से उठाकर हरेक हिंदू के मानस में स्थापित कर दिया. अब बाबर के सेनापति मीर बाकी भले मंदिर की जमीन पर मस्जिद बना ले; लेकिन करोड़ों हिंदुओं के दिलों में जिनका मंदिर तुलसी ने बना दिया; उसे कब्जाना संभव ही नहीं था. हमारे पुरखों को भरोसा था कि हम अपनी आध्यात्मिक लड़ाई कभी नहीं हारेंगे. मुझे लगता है कि पुरबिया लोक राम के भरोसे ही रहा है. शादी विवाह में भी लोग अक्सर मानस का पाठ करवा के ही आगे का काम करते हैं. जो लोग राम के अस्तित्व का सवाल उठाते हैं, उनके जवाब में पूरब के लोगों का बस यही कहना है कि; रामभक्त हनुमान तुम्हें कभी माफ नहीं करेंगे. वो चिरकाल तक इस धरती पर रहेंगे, कभी सामना हो गया तो राम को अपने सीने में दिखा देंगे.

पुरबिया लोक भी राम को अपने सीने में ही रखता है. राम; इतने सरल हैं कि सभी रिश्तों की मर्यादाओं को जगती के सामने आदर्श और अनुकरणीय बना देते हैं. पुरबिया लोक; राम का लोक है. राम; उसके मानस के इष्टदेव हैं. राम के बिना वे किसी और को नहीं जानते. पुरबिया लोक में जन्म के समय अवध में बाजे बधैया वाला सोहर होता है तो मृत्यु के समय राम नाम सत्य है! का उद्घोष.

पाकिस्तान ने भारत से ज़्यादा जमीन कब्जा कर रखा है!

पाकिस्तान के आम लोगों में भारत के लोगों को लेकर कोई दुर्भावना नहीं है, जैसाकि न्यूज़ चैनल्स दिखाते रहते हैं. वहां के लोग भी बहुत उदार और नेकदिल होते हैं. लेकिन भारतीय और पाकिस्तानी मीडिया ने बचपन से हमारे दिलों में एक दूसरे के लिए ज़हर बो दिया है. हमारे दिमाग़ में ऐसा भर दिया गया कि पाकिस्तान हमारा दुश्मन है. दरअसल, दोनों देशों के बीच में समस्या आतंकवाद और जम्मू कश्मीर बंटवारे के विवाद को लेकर है. हमारी तरह है आम पाकिस्तानियों के मन में भी ये बिठा दिया गया है कि भारत के लोग आतंकियों को पालते हैं. लेकिन ये सरासर दोनों देशों में आतंकी हमले हुए हैं.

आतंकियों को फंडिंग पूरा पाकिस्तान नहीं करता है और ना ही पूरा अफगानिस्तान. कुछ चंद लोग हैं; जो इन गतिविधियों में संलिप्त हैं. भारत और पाक के बीच कोई सीमा विवाद नहीं है. एक बड़ा हिस्सा समझौते में पाकिस्तान को दिया जा चुका है. इसके बावजूद वहां की सरकार भारतीय हिस्से में और अधिक मांग करता रहता है. लेकिन भारतीय मीडिया का राष्ट्रवाद ये साबित करने में मुस्तैद रहता है कि नहीं पाकिस्तान को तो हम कुछ नहीं देंगे. जबकि असलियत ये है कि हमने पाकिस्तान और बांग्लादेश को समग्र भारतवर्ष का बड़ा हिस्सा पहले ही दिया हुआ है. जब आप क्षेत्रफल और आबादी के हिसाब से देखेंगे तो पाकिस्तान के पास प्रति व्यक्ति भूमि भारत से कहीं ज्यादा है.

आइए समझते हैं-

भारत की कुल जनसंख्या – 125 करोड़
भारत का क्षेत्रफल – 32 लाख वर्ग किमी

पाकिस्तान की कुल जनसंख्या – 22 करोड़
पाकिस्तान का क्षेत्रफल – 8.82 लाख वर्ग किमी

मतलब; एक भारतीय के पास भूमि- 2.5 वर्ग मी
पाकिस्तान के एक आदमी के पास भूमि- 4 वर्ग मी

अब बताइए भूमि तो पाकिस्तान के पास अधिक है, फिर भी मीडिया छद्म राष्ट्रवाद में फंसकर ऐसा दिखाती रहती है कि पाकिस्तान बेचारा है; और उसे कश्मीर राग अलापने का मौका देते रहना चाहिए. भाई!ये तो भारतीय मीडिया का देश के लोगों के लिए ही कुठाराघात है, कायदे से तो ज्यादा जमीनें पाकिस्तान ने कब्जा रखी हैं. मेरा ये पोस्ट लिखने का सिर्फ़ एक ही मकसद है कि सभी लोग एक जैसे नहीं होते हैं इसलिए सबके लिए एक तरह की अवधारणा नहीं बनानी चाहिए.

13 नवंबर की डायरी से

जो लोग अपने मूल्यों और सिद्धांतों के लिए किसी तरह का समझौता नहीं किये. अपने स्वाभिमान के साथ अडिग बने रहे. छोटे-मोटे हितलाभ को दरकिनार कर कठिनाई और चुनौतीपूर्ण जीवन व्यतीत किये. वे ही महामानव हैं. राजकुमार सिद्धार्थ के पास राजगद्दी थी, लेकिन उन्होंने कभी अपने वैचारिक आंदोलन और उद्देश्यपूर्ण खोज को अधर में छोड़ राजा बनने की आतुरता नहीं दिखाई. उन्होंने राजयोग को छोड़ा. उन्होंने अपने गृहस्थ धर्म का त्याग कर दिया, लेकिन उन्होंने धम्म की खोज की.

हम और आप चंद रुपयों और प्रतिष्ठा के लिए क्या नहीं करते. आजकल तो लोग बेइमानी और झूठ का सहारा लेकर भी अपनी महत्वाकांक्षा का दांव चल रहे हैं. छोड़िए, अधिकांश मौकापरस्त और बनावटी लोग समाज और प्रभाग में विशेष पदों पर क़ाबिज़ हैं और उन्हें वे लोग पसंद हैं, जो आपके आगे-पीछे चक्कर मारे.आपकी हां में हां मिलाए. आपको पसंद आने वाली ही बातें करें. संस्थानों और विभागों में भी ऐसे विदूषक लोग, बिना किसी मानक और योग्यता के बड़े से बड़े पदों पर पदस्थ हैं. इन संस्थानों के लिए उन लोगों का कोई मोल नहीं, जो दिन रात एक करके उस विभाग के कार्यों का पूरी निष्ठा से पालन कर रहे हैं.

चाटुकारिता एक विकार है. इसीलिए साहित्य में राजाओं की चाटुकारिता करने वाले लोगों को भाट कहा जाता है. जरूरी नहीं है कि सभी लोग अपने आत्मसम्मान के साथ समझौता करने के लिए तैयार हो. इसलिए इन विदूषकों के चक्कर में मत पड़िए. अपने कार्यक्षेत्र और संस्थान के प्रति पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ काम कीजिए. जिसे कहीं न्याय नहीं मिलता, उसका न्यायदाता ईश्वर होता है. सोचिए, कि अगर हमारे स्वतंत्रता सेनानी सुखभोगी और विलासी होते तो क्या आज ये आजादी नसीब होती. उन्होंने चुनौतीपूर्ण जीवन बिताया और अपने मिशन के लिए संकल्प को कभी नहीं भूले.

12 नवंबर की डायरी से

अगर किताबें पढ़ने की आदत एक बार बन गई तो आप इसके बिना रह ही नहीं पाओगे. बड़ी अजीब सी लत है ये भी. हर हफ्ते नई किताबें. हर समय एक नया विषयवस्तु जानने समझने की होड़. मानसिक फिटनेस के लिए भी अध्ययन और मनन बेहद जरूरी है. जो लोग पढ़ने के शौकीन हो गये हैं, वे कभी निराशावादी नहीं हो सकते. संघर्षों के सामने हताश नहीं हो सकते. ऐसे लोगों के पास चिंतन की प्रावस्थाएं होती हैं, जिनके जरिए वे किसी भी परिस्थिति और प्रतिकूलता में भी डटे रहते हैं.

बिहार में एनडीए की फिर से जीत पर नीतीश सरकार को कैसे बधाई दी जाए? जो सरकार एक महामारी में लोगों को निशुल्क इलाज और समुचित व्यवस्थाएं नहीं दे पाई. उसके लिए देश के प्रधानमंत्री तक को पूरा जोर झोंकना पड़ा. महामारी के काम धाम ताक पर रख भारत सरकार बिहार कूच कर गई. अभी तो वैक्सीन आई नहीं, पर वैक्सीन आने के बाद जनता के साथ फिर से धोखाधड़ी करने की नौबत तो अब नहीं आनी चाहिए.

अमेरिका में ट्रंप की हार की मूल वजहें ब्लैक लाइव्स मूवमेंट और कोरोना महामारी में लापरवाही करना ही रहा. अमेरिका के लोगों ने ट्रंप से भरोसा करना छोड़ दिया, लेकिन बिहार के लोगों की राजनीतिक आस्था बरकरार रही. बहरहाल, तेजस्वी यादव के प्रदर्शन पर कोई सवाल नहीं खड़ा कर सकता. मसलन, कांग्रेस अगर थोड़ा और मेहनत की होती तो सत्तापलट मुमकिन हो पाता. बिहार में 19 लाख रोजगार के अवसर पैदा करना भी एनडीए के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण काम है. नीतीश कुमार तो चुनावी रैलियों में ही इस पर सफाई दे चुके हैं कि कहां से दस लाख सरकारी नौकरियां आएंगी और बिना समंदर उद्योग कैसे लगेगा.

प्लूरल्स पार्टी की संस्थापक पुष्पम प्रिया भले ही चुनाव में हार गई लेकिन वो जबसे चुनाव प्रचार में उतरी थीं, लगातार बिहार में बंद हो चुके लघु और मध्यम उद्योगों की बदहाली की तस्वीरें अपने सोशल मीडिया के जरिए प्रकाशित करती रहीं. बिहार में बाढ़ की विभीषिका में पप्पू यादव का दिखावे के लिए ही सही, लेकिन जो वीडियो में लोगों की मदद करते देखा गया, वो अविस्मरणीय है.

चिराग पासवान भी अपने विजन के दम पर कुछ करने की चाहत रखने की कोशिश में थें, लेकिन उन्हें तो रामविलासजी के निधन के तौर पर भी जन सहानुभूति नहीं मिल पाई. एग्जिट पोल के नतीजे भले गलत साबित हुए हो, पर बिहार वेलफेयर के लिए सत्ता का स्थायी बन जाना आगे चलकर बहुत नुकसानदेह साबित होगा.

वेद: एक समग्र अध्ययन (भाग-दो)

वेद, विज्ञान का पक्षधर है. चूंकि वेद किसी एक ऋषि ने नहीं लिखा, इसके समय-समय पर अनेक संकलनकर्ता हुए. वेद में सिर्फ देवताओं की स्तुतियां नहीं हैं. राजनीति के विषय हैं, भूगोल है, चिकित्सा शास्त्र है. परामर्श के विषय हैं. लेकिन विज्ञान इसका मुख्य उपांग है. वेद में कुछ भी जोड़ने से पहले उस सूक्त पर विचार विमर्श होते थे. समितियां बैठती थी. मुझे पूरा भरोसा है कि जब मानव ने सूर्य से उष्णता या ऊर्जा पाई होगी तो उसे शुक्रिया अदा करने के लिए उसे देव बना दिया, हाथ पैर तो कल्पनाएं थीं! जब सीरियल और फिल्म बनाये गये तो उन्होंने इस कल्पना को सहज नहीं रहने दिया और सूरज का मुख बना दिया, उसके घोड़े बना दिये. सूरज के घोड़े होने की साहित्यिक अभिव्यंजना ये हुई कि सूर्य हमारे ऋषियों को निरंतर गतिशील दिखा. अब जब हमारे वैज्ञानिकों ने ये ढूँढ लिया कि दरअसल, सूरज नहीं धरती और सौर मंडल के ग्रह उपग्रह गतिशील हैं तो फिर पृथ्वी भी हमारे लिए पूजनीया होनी चाहिए थी. अब हम अपने पुरखों को इस अवैज्ञानिकता के लिए दोषी तो नहीं ठहरा सकते, उसमें सुधार और बदलाव के बीज तो बो ही सकते हैं. सूरज को गतिशील देख उसको सही ठहराना उनका भावी तदर्थ था. हमने वैज्ञानिक शोधों में उसे अनुचित करार दिया फिर भी वे वैदिक संकलन हमारे लिए महत्वपूर्ण और गौरवशाली हैं, क्योंकि तब हमारे पास शोध के उपकरण और चेतना की वृत्ति सीमित थी.

ऋग्वेद में जिनको देवतुल्य माना गया या उनकी स्तुतियां गाई गई. वे सभी ऊर्जा के प्रमुख संसाधन हैं. जहां तक इंद्र की बात है तो इंद्र के अर्थ को हमने देवलोक के राजा के रूप में लिया. हमारे ऋषियों को लगा कि अग्नि, वायु(हवा), वरूण(जल) इत्यादि देवताओं को निर्देश और सुझाव देने और जो कार्य इन सभी से नहीं होता होगा उसे जो करता होगा वो इंद्र होगा. दरअसल, इंद्र का व्यापक अर्थ राजा से है. ऋग्वेद के मुताबिक इंद्र ने नदियों का निर्माण किया. इंद्र ने ऊंचे पहाड़ों को काटकर पवन को बेरोक टोक चलने का मार्ग प्रशस्त किया. इंद्र प्रजापालक हैं और जो कोई भी जनहितैषी काम करता है वो इंद्र है. मतलब गांधी और नेहरू भी इंद्र हुए. नेल्सन मंडेला और मार्टिन लूथर भी इंद्र हुए. देवलोक और इंद्र हमारे सृजनकर्ताओं की कल्पनाएं भी तो हो सकती हैं और साहित्य में कल्पनातिरेक पर कोई मनाही नहीं है. लाखों साल पहले जिन भावी कल्पनाओं को हमारे मुनियों ने तरजीह दी. वही आज वैज्ञानिकता के दौर के ऊर्जा के मूलभूत संसाधन हैं. साहित्य को उस समय, काल और परिस्थिति के हिसाब से समझने की कोशिश करेंगे और उसे व्यापक अर्थों में समझेंगे तभी जाकर उसका सही मायने लक्षित होगा. नहीं तो फिर हम कूपमंडूक ही बने रहेंगे.

एवमस्तु!

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