काशी /बनारस /वाराणसी

कबीरा खड़ा बाजार मे , लिए लुकाठी हाथ ।
जो घर जारो आपनो ,चल्यो हमारो साथ ।।

बनारस का कबीर यह साबित कर देता है कि बनारस का एक अनपढ़ जो बातें बता देता है आज लोग उनकी लाइनो पर पी.एच.डी. करते हैं ।
बनारस एक से एक धुरंधरो को पैदा करने वाली धरती हैं । बनारस में हिन्दी खडी बोली और भारतीय पत्रकारिता को एक नई दिशा देने वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पैदा हुए ।

सोजे वतन लिखने वाले प्रेमचन्द्र , जिनकी इस किताब को अंग्रेजो ने जला दिया था , बनारस के लमही मे पैदा हुए थे ।

जयशंकर प्रसाद जिनकी कामायनी विश्व प्रसिद्ध हैं , बनारस मे ही पैदा हुए थे । यह वही बनारस है जहाँ महान शिक्षाविद् पं मदन मोहन मालवीय जी ने इसे शिक्षा का अद्वितीय केन्द्र बनाया ,बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना करके ।

प्रकृति :एक परिचय

प्रकृति जीव – जंतु ,पेड़ -पौधे ,जल ,वायु , और  धरती , पर्वत ,पहाड़ से मिलकर बना हैं । प्रकृति का जन्म अरबों वर्ष पूर्व हुआ था । सबसे पहले जल बना । इसके बाद जल से एककोशिकीय जंतु और फिर बहुकोशिकीय जंतुओं का निर्माण हुआ । फिर एक अनमोल वस्तु आया जो शायद जो हमारे जीवन के लिए हर पल प्रयास करता रहता हैं , जिसका नाम है वृक्ष । हमारा वजूद इसलिए है क्योंकि हमारे साथ प्रकृति हैं ।अगर एक पल के लिए इसने हमारा साथ छोड़ दिया तो शायद हम अपने वजूद को तलाशने में असफल हो ही जायेंगे । क्या बिना जल के मनुष्य जीवन की कल्पना कर सकता है ? क्या बिना जंगल के जीवन की बुनियाद बनाई जा सकती हैं , क्या बिना धरती के अन्न का उत्पादन और जीवन का शुभारम्भ हो सकता था ? सबका जवाब है  नहीं ।

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हम भी  प्रकृति के ही भाग हैं । लेकिन शायद बुद्धिमान मानव बनते ही हम इतने बुद्धिमान बन गये कि हमें यह खयाल ही नहीं रहा कि हम उस प्रकृति से टक्कर लेने चल पड़े है । जिसने हमें एक प्रक्रिया के तहत जीवित रखने का पूरा प्रयास किया । आज प्रकृति से खिलवाड़ करने वाला कोई छोटा से बड़ा वैज्ञानिक प्राकृतिक आपदाओं के आते ही क्यों शांत हो जाता हैं ? आज दुनिया का कोई वैज्ञानिक क्यों कोई उपाय नहीं ला सकने में समर्थ हो पा रहा है? क्यों भूकंप आते ही दुनियाभर के वैज्ञानिक अपनी सूझबूझ दिखाने में अपने आपको असमर्थ पाते हैं ?

यह वही प्रकृति हैं जिसने हमारे हजारों कसूरों को माफ किया । हाँ ,हम कसूरवार थे क्योंकि हमने शायद यह सोचा ही नही कि हमारी हदे कहा तक हैं । हम जब विज्ञान युग में प्रवेश कर रहें थे तो शायद उपलब्धिया गिनाने की होड़ मे हम यह भूल गये कि इससे हमारा फायदा कम और नुकसान ज्यादा हो सकता हैं । हमने हद से ज्यादा तरक्की की । इसमें कोई संदेह नहीं हैं । लेकिन तरक्की तब तक ही सही है जब तक फायदा हो रहा हो ।

मै बुद्धिमान मानवो से पूछना चाहता हूं कि क्या उनके पास इस प्रश्न का जवाब है कि ओज़ोन परत जो हमे ब्रह्माण्ड के नुकसानदेह किरणों से बचाती थी । उन्होने AC( वातानुकूलित ) लाकर उसे क्षति पहुँचाकर पूरी दुनिया पर संकट लाने की कोशिश नहीं की है । हमने केवल अपने हित को साधने के चक्कर में सभी  प्रकार के जंतुओं ,वनस्पतियों और इस संरचना को ध्वस्त करने का प्रयास किया है । जो हमारे साथ-साथ पूरी पृथ्वी को ले डूबने मे सक्षम है ।

First class indian , Third class politician

देश की सत्ता  हमें आपस में धर्म के नाम पर लड़ाती हैं । जब कभी  देश मे साम्प्रदायिक दंगे नहीं होते है तो इन्हें ऐसा लगता है कि शायद उनका समय बेकार जा रहा हैं । कहने को लोकतन्त्र प्रणाली मे जनता द्वारा किया गया शासन चलता है । लेकिन कई बारी उसी के शासन में उसे गिड़गिड़ाते देखा गया है । उसी के शासनकाल में उसे पीटते हुए देखा गया हैं । हमारी सभ्यता , विदेशी सभ्यताओं से दबी कुचली पडी है । जिस सभ्यता को 347 सालों मे अंग्रेज नहीं मिटा पाये । आज हम उसकी चिन्ता ही नहीं करते । साम्प्रदायिक सौहार्द को ताक पर रखकर हम मजहबी हिंसा पर उतर आये हैं । हाँ हमारी संस्कृति जंगली थी , लेकिन उसी जंगल में रहकर हमारे मनीषियों ने पूरी दुनिया को ज्ञान बाँट कर विकास के मार्ग पर बढने की बात की । भारत का पतंजलि दुनिया को योग सिखाता है । भारत का सुश्रुत शल्यचिकित्सा को प्रतिपादित कर पूरे विश्व पर      एहसान करता हैं । भारत का आर्यभट्ट दुनिया को 9 के आगे की गिनती सिखाता हैं । भारत का धुरंधर विवेकानन्द जब शिकागो मे भाषण देता है तो दुनिया के सारे धर्म उसके सामने घुटने टेक देते हैं ।

भारत का एक ब्रिगेडियर हनुमान जब लंका में सीता माता का अपमान होता हुआ देखता है ,तो पूरी लंका को जलाकर राख कर देता हैं । हमारे यहाँ की प्रतिभाओं का सामना कर पाना  मुश्किल ही नहीं  , नामुमकिन है । हमें भारतीय होने पर गर्व होना चाहिये  ।
भारत के ऋषि कणाद ही सबसे पहले परमाणु का जिक्र करते हैं । भारत के जगदीश चन्द्र बोस ही सबसे पहले वनस्पतियों की भावनाओं को समझते है । भारत के ऋषि भारद्वाज पहली किसी समिति मे विमान की बात करते हैं ।

आज किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे है । पिछले तीन दशको में लाखों किसानो ने आत्महत्याए की ।लेकिन यह भारत भूमि इतनी उपजाऊ है कि –

         भारत ही एक ऐसी धरती
        मिलती जिससे चौसठ भिन्न ।
       हर धर्म , विविधता होते भी 
        एकता मे बसते नित नव मन ।

युवा भारत ,बुज़ुर्ग लोकतन्त्र

कहने को तो भारत को युवा भारत कहते हैं । लेकिन क्या यह प्रतिमान दिखाई देता है । जिस देश में युवाओं की आबादी ज्यादा हो , जिस देश को युवाओं का देश जैसा ख्याति प्राप्त हो । क्या उसे बुज़ुर्गो को लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीति निर्धारण का जिम्मा देना ठीक हैं ।
और ऐसा भी  नहीं है कि भारत के युवा इसके लायक नहीं है या काबिल युवाओं की कमी है भारत में । नहीं भाई ,ऐसा एकदम नहीं है । भारत की युवा पीढ़ी अपने काबिलियत का लोहा पूरी दुनिया से मनवा चुकी हैं । फिर ये लाचारी क्यों ? क्यों भारत का युवा इस बात को गंभीरता से नहीं ले रहा ?

राष्ट्रहित ,समाजवाद ,राष्ट्रवाद और जनहित ऐसे मुद्दे हैं जिनसे सतत् गति प्राप्त की जा सकती हैं । नेहरुजी ने पहली पंचवर्षीय योजना मे ही यह दावा किया था कि भारत की जनता को प्राथमिक सुविधाएँ मुहैया करायी दी जायेगी । लेकिन शायद आज मोदीजी को भी बिहार मे यहीं बातें या यूँ कहे कि खोखले वादे फिर से दुहराये जा रहे हैं ।

पानी पर राजनीति

दिल्ली ,मथुरा ,महाराष्ट्र  और पंजाब पर पानी ना मिलने का संकट या ऐसा कहे कि पानी की विकट समस्या है । पंजाब में भूजल का पानी इतना प्रदूषित हो चुका है कि वहाँ के
लोगो को कैंसर जैसे जानलेवा रोग की चुनौती का सामना करना पड़ रहा हैं । हर दिन वहाँ पर कैंसर के रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही हैं। दुनिया का कोई वैज्ञानिक एक बूँद पानी बनाने में सक्षम नहीं है । ” बिन पानी सब सून ” रहीमदास ने हमारे सामने पानी की महत्ता से जुड़ा यह पद कितना पहले दे दिया था । और हम आज भी  जल संरक्षण पर चुप्पी काढे बैठे हैं ।
दूसरी तरफ हर राज्य का छोटा बड़ा नेता पानी पर बाकायदा राजनीति कर रहा हैं ।गाँधी और बिनोवा की माने तो पानी साझा संपत्ति हैं ।

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